‘मैं भारत हूँ’ अप्रैल २०१७ की पत्रिका—सम्पादकीय

‘हिंदी’ को मिल रहे सम्मान से मन प्रपुâल्लित होता जा रहा….

वर्र्षों से हिंदी व सभी भारतीय भाषाओं की समृद्धि बढ़े, प्रयासरत हूँ। गत दिनों सभी भारतीय सरकारी दफ्तरों, राष्ट्रपति-प्रधानमंत्री-वेंâद्रीय संसदीय भाषाई कार्यालय, राजकीय मुख्यमंत्री कार्यालयों व सभी भारतीय भाषाई सेवी संस्थानों से प्राप्त सम्मानों से मन प्रपुâल्लित होता जा रहा है कि अब भारत-हिंदुस्तान ‘हिंदीमय’ होगा, भारतीय संस्कृति से अपना भारत सुसंस्कृत रहेगा, अपने भारत की ‘हिंदी’ जो विश्व में सबसे ज्यादा बोली जाती है वह संयुक्त राष्ट्र की भाषाई संस्कृति में प्रथम दर्जे में अधिशासित होगी।
कहते हैं यदि सच्चा प्रयास यदि किया जाए फिर भी सफलता ना मिले तो हतोत्साहित ना होकर मन:स्थिति को मजबूत कर, कार्य किया जाता रहे, एक दिन सफलता सिरमौर होकर कहेगी, ‘आगे बढ़ो-जग तुम्हारे साथ है’ यही तो सोच हमारे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की थी जो जीवन पर भारत की आजादी व भाषा के लिए लड़ते रहे, अखिरकार १५ अगस्त १९४७ को आजादी तो प्राप्त हो गई पर भाषाई स्वतंत्रता अब प्राप्त होगी, मुझे विश्वास हो चला है।
मत कहें कि आजादी को ७० साल बीत रहे है अब ये कहें कि मात्र ७० दिनों में भाषाई स्वतंत्रता प्राप्त होगी, क्योंकि हमारे पंतप्रधान बहुत ही मधुरवंâठी ‘हिंदी’ बोलते हैं और मैं उनका शार्गीद जो हूँ।
माननीय राष्ट्रपति जी को मैंने एक पत्र लिखा था कि गणतंत्र व स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर आप हम भारतीयों को ‘हिंदी’ में संबोधन करें ताकि हम भारतीय विशेषकर मैं समझ सवूँâ कि मेरे भारत के राष्ट्रपति के स्वविचार क्या हैं?
खबर चली है राष्ट्रपति कार्यालय से, छपी दैनिक अखबारों में, कि अब राष्ट्रपति व प्रधानमंत्री ‘हिंदी’ में संभाषण करेंगे, जल्द ही वेंâद्रीय विद्यालयों और सीबीएसई स्वूâलों में १०वीं कक्षा तक ‘हिंदी’ की पढ़ाई जरुरी हो सकती है, विश्वास दिलाता हूँ कि एकfिदन भारत के सभी शिक्षा मंदिरों में ‘हिंदी’ के साथ प्रांतिय भाषा के पठन-पाठ्य में जोर दिया जायेगा और हमारी भारतीय संस्कृति का परचम विश्व में लहरायेगा।
अनंतोगत्वा जीवन के अंतिम क्षणों तक भारतीय भाषाई संस्कृति का सम्मान बढ़ाने के लिए प्रयासरत रहूँगा, ऐसा विश्वास दिलाता हूँ।

जय भारत!
जय भारतीय संस्कृति!

राष्ट्र की परिभाषा
भाव-भूमि-भाषा

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