राष्ट्रभाषा के बारे में गांधीजी के वि‍चार – हिंदी कल्याण न्यास

दिनांक: ४-३-१९०९:   हिंदुस्तान को ग़ुलाम बनाने वाले जो हम अंग्रेज़ी जानने वाले लोग हैं। प्रजा की हाय अंग्रेज़ों पर नहीं, बल्कि हम लोगों पर पड़ेगी।

 

 

दिनांक: ६-२-१९१४:  अंग्रेज़ी भाषा हमारे राष्ट्र के पाँव में बेड़ी बन कर पड़ी हुई है।

दिनांक १०-५-१९१७ हिंदी  ही हिंदुस्तान के  शिक्षित समुदाय की  भाषा हो  सकती है। यह निर्विवाद है। यह कैसे हो-केवल  यही विचार  करना है। जिस स्थान  को लेने का अंग्रेज़ी भाषा प्रयत्न कर रही है और जिसे लेना उसके लिए असंभव है। वही  स्थान हिंदी को मिलना चाहिए, क्योंकि हिंदी का उस पर अधिकार है। यह स्थान अंग्रेज़ी को नहीं मिल सकता है, क्योंकि वह विदेशी भाषा है और हमारे लिए  बड़ी कठिन है। अंग्रेज़ी की अपेक्षा हिंदी सीखना सरल है।

सितम्बर १९२०: सच्चा शिक्षित तो वही मनुष्य कहा जा सकता है जो अपने शरीर को अपने वश में रख  सकता हो  और जिसका शरीर  अपना सौंपा हुआ  काम  आसानी और सरलता से कर सकता हो।…जो विद्या  हमें मुक्ति से दूर  भगा ले जाती  हो वह त्याज्य है, राक्षसी है, अधर्म है।…देशी भाषा का अनादर राष्ट्रीय अपघात है।

सितंबर १९२०: माता का  दूध पीने से  लेकर ही जो सँस्कार और मधुर  शब्दों द्वारा जो शिक्षा मिलती है उसके और पाठशाला की शिक्षा के बीच संगत होना चाहिए। परकीय भाषा से वह शृंखला टूट जाती है और उस शिक्षा से पुष्ट होकर हम मातृद्रोह करने लग जाते हैं।

दिनांक २१-४-१९२०: माध्यम की आवश्यकता पर तो किसी तरह का इतराज नहीं उठाया जाता। पर वह माध्यम, अंग्रेज़ी नहीं हो सकती।…हमारी शिक्षा प्रणाली में अंग्रेज़ी भाषा को देशी भाषाओं से उच्च स्थान दिया गया है। यह कैसी अप्राकृतिक घटना है। यह शिक्षा प्रणाली राक्षसी है। मैंने अपना जीवन इसी प्रणाली के नष्ट करने के लिए दे  रखा है।

दिनांक १३-४-१९२१: यह शिक्षाप्रणाली अत्यन्त दुष्परिणामकारी है। इस प्रणाली को नष्ट करने के लिए मैं तन, मन से प्रयत्न कर रहा हूँ।

दिनांक १-९-१९२१: अब रही शिक्षा के माध्यम की बात। इस विषय पर मेरे विचार इतने स्पष्ट है कि यहाँ उनके दोहराने की ज़रूरत नहीं। इस विदेशी भाषा के माध्यम ने लड़कों के दिमाग़ को शिथिल कर दिया और उनकी शक्तियों पर अनावश्यक जोर डाला, उन्हें रट्टू और नक़लची बना दिया, मौलिक विचारों और कार्यों के लिए अयोग्य कर दिया और अपनी शिक्षा का सार अपने परिवारवालों तथा जनता तक पहुँचाने में असमर्थ बना दिया है। इस विदेशी माध्यम ने हमारे बच्चों को अपने ही घर में पूरा पक्का परदेशी बना दिया है। वर्तमान शिक्षा-प्रणाली का यह सबसे बड़ा दु:खांत दृश्य है। अंग्रेज़ी भाषा के माध्यम ने हमारी देशी भाषाओं की बढ़ती को रोक दिया है। यदि मेरे हाथ में मनमानी करने की सत्ता होती तो मैं आज से ही विदेशी भाषा के द्वारा हमारे लड़के और लड़कियों की पढ़ाई बन्द कर देता, और सारे शिक्षकों और अध्यापकों से यह माध्यम तुरंत बदलवाता या उन्हें बर्खास्त  करता।  मैं पाठ्य पुस्तकों की तैयारी का इंतज़ार न करता, वे तो परिवर्तन के पीछे-पीछे चली आवेंगी।  यह ख़राबी तो ऐसी है, जिसके लिए तुरन्त इलाज की ज़रूरत है।…मेरा तो यह निश्चित मत है कि दुनिया में किसी संस्कृति का भण्डार इतना भरा पूरा नहीं है जितना कि हमारी स्सकृति का है। हमने उसे जाना नहीं है, हम उसके अध्ययन से दूर रखे गये हैं और उसके गुण को जानने और मानने का मौक़ा हमें नहीं दिया गया है।

दिनांक २-२-१९२१:  अंग्रेज़ी के मोह से छुटना स्वराज्य का आवश्यक और अनिवार्य तत्त्व है।

दिनांक ५-७-१९२८।  हमारे यहाँ विदेशी भाषा के  माध्यम ने राष्ट्र की शिक्षा  हर ली है। विद्यार्थियों की आयु घटा  दी है। उन्हें आम लोगों से दूर कर दिया है और शिक्षा को बिना कारण र्चीला बना दिया है। देश के नौजवानों पर एक विदेशी भाषा माध्यम थोप देने से उनकी प्रतिभा कुंठित हो रही है और इतिहास में इसे विदेशी शासन की बुराइयों में से सबसे बड़ी बुराई माना जाएगा। इसलिए शिक्षित भारतीय अपने आपको विदेशी से इस व्यामोह से जितनी जल्दी मुक्त कर लेंगे, हिंदी और देशी भाषाओं को अपना लेंगे, उतना ही अच्छा होगा।

दिनांक ५-७-१९२९:  यदि अंग्रेज़ी माध्यम से शिक्षण की प्रक्रिया जारी रही तो यह राष्ट्र की अस्मिता नष्ट कर देगी।
दिनांक १५-१०-१९३४: बिना राष्ट्रभाषा के राष्ट्रवादी नहीं हुआ जा सकता है, वैसी ही हालत में अंतरराष्ट्रीय-वादी होना भी नामुमकिन है। अंतरराष्ट्रीयता तभी संभव है जबकि राष्ट्रीयता वास्तवि‍    स्थापित हो जाती है।
दिनांक १५-८-१९४७ :  दुनिया से कह दो कि ‘गांधी अंग्रेज़ी नहीं जानता’।

संकलन: श्री. निर्मलकुमार पाटोदी,
विद्यानिलय, ४५, शांति निकेतन, (बाॅम्बे हाॅस्पीटल के पीछे),
इंदौर-४५२०१० मध्य प्रदेश

सम्पर्क:०७८६९९१७०७० ।  मेल: nirmal.patodi@gmail.com

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2 Comments

  1. Sanjayakumar G Rathod

    हिंदी का प्रचार-प्रसार करना हमारा कर्तव्य है । जय हिंदी

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