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हिंदी का विकास बनाम सुनियोजित प्रयास

यूँ तो देश में हिंदी और भारतीय भाषाओं के प्रसार के लिए हजारों सरकारी व गैर-सरकारी संस्थाएं मौजूद हैं। ऐसी संस्थाओं की भी कोई कमी नहीं जो काफी साधन-संपन्न हैं। हिंदी व भारतीय भाषाओं की अकादमियों की भी कोई कमी नहीं। इसी प्रकार देश में हिंदी भारतीय भाषाओं के कथित सेवकों की संख्या भी लाखों में है। इनमें ऐसे धनाढ्य भाषा – सेवकों की भी कमी नहीं जो नृत्य-संगीत या कवि सम्मेलन आदि करवा कर और ऐसी ही कुछ पुस्तकों व साहित्यकारों को पुरस्कृत कर हिंदीसेवा के कार्य़ को पूर्णता प्रदान कर रहे हैं। यह देखने में आता है कि इनमें से ज्यादातर केवल कहानी कविता जैसी साहित्यिक गतिविधियों तक ही सीमित है। इनमें से ज्यादातर लोगों के लिए भाषा का मतलब विभिन्न विषयों का वाड्.मय या साहित्य नहीं केवल ललित साहित्य है, जो अब धीरे-धीरे केवल कहानी और कविता तक सिमटता जा रहा है। तमाम संसाधन, प्रोत्साहन व पुरस्कार भी प्राय: ऐसी गतिविधियों के इर्द-गिर्द ही सिमटे हैं ।

परिणामस्वरूप शिक्षा-रोजगार, व्यापार-व्यवसाय और ज्ञान-विज्ञान आदि के क्षेत्रों भारतीय भाषाओं के चहुंमुखी विकास के लिए कार्य करने वाले कम लोग ही दिखते हैं, जिनकी संख्या नगण्य सी ही है। ऐसे कुछेक लोगों में एक महत्वपूर्ण नाम है – अतुल कोठारी । अतुल कोठारी का पूरा जीवन भारतीय भाषाओं शिक्षा व संस्कृति की उत्थान के प्रति समर्पित रहा है और वे माँ भारती के सच्चे सुपूत की तरह अपने कर्तव्य का निर्वाह कर रहे हैं।

अतुल कोठारी शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास के राष्ट्रीय सचिव  और शिक्षा बचाओ आन्दोलन समिति के राष्ट्रीय सहसंयोजक हैं। ज्ञान-विज्ञान, शिक्षा व रोजगार तथा व्यापार व व्यवसाय में हिंदी सहित तमाम भारतीय भाषाओं को स्थापित करने के लिएलंबे समय से प्रयासरत हैं। यूं तो विद्यार्थी काल से ही इनकी सामाजिक प्रवृत्ति रही और ये सामाजिक कार्यों में जुड़े रहे लेकिन 1979 से ये सक्रिय रूप से देश-प्रेम के जज्बे से ऐसे कार्यों में सक्रिय हुए जिनका सरोकार भारतीयता से था ।

कहा जाता है कि यदि किसी देश को नष्ट  करना हो तो उसके लिए जरूरी है कि उसकी भाषा को मिटा दें। जब भाषा जाएगी तो संस्कृति और भाषा में सन्निहित ज्ञान-विज्ञान भी स्वयंमेव नष्ट होता जाएगा । इसीलिए तमाम विदेशी आक्रमणकारियों ने यही किया और स्वाधीनता के बाद भी वह प्रक्रिया थमी नहीं बल्कि घनीभूत होती चली गई । देश-प्रेम के जज्बे के चलते शायद यही कारण था जिसके चलते अतुल कोठारी भारतीय भाषाओं के उत्थान के कार्य में सक्रिय हुए।

 

अतुल कोठारी बताते हैं, ‘सामाजिक जीवन में काम करते हुए मुझे कई बार ऐसे अनुभव हुए कि भारत में अपनी भाषाओं को लोग पर्याप्त सम्मान नहीं देते। यही नहीं अक्सर अपनी भाषाओं का तिरस्कार भी किया जाता है। अनेक लोगों में, विशेषकर अंग्रेजी पढ़े-लिखे लोगों में तो अपनी भाषा को लेकर एक लघुता की ग्रंथी है।  अक्सर विमान में केवल अंग्रेजी का ही अखबार दिया जाता रहा है। एक बार मैंने परिचारिका से हिंदी अखबार देने की मांग की । वह कहीं से ढूंढ कर एक अखबार लाई।  मेरे आस-पास बैठे कई लोगों ने भी हिंदी का अखबार पढ़ना चाहा। मैंने उनसे पूछा कि आप भी हिंदी का अखबार क्यों नहीं मांगते ? पर बात यह थी कि हिंदी का अखबार मांगने का साहस कौन करे ? तब मुझे लगा कि इस देश में हिंदी या अपनी भाषा को लेकर कितनी हीन ग्रंथी है।‘

वे एक किस्सा बताते हैं , ‘एक बार जब विमान में जब उद्घोषणा केवल अंग्रेजी भी की गई तो मैंने पूछा कि उदघोषणा केवल अंग्रेजी में क्यों, यह तो भारत है ? मैंने कहा, ’यहां उद्घोषणा हिंदी में तो होनी ही चाहिए। लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई। मांगने पर शिकायत पुस्तिका भी उपलब्ध नहीं हुई। तब मैंने संघर्ष का रास्ता अपनाया और गंतव्य पर पहुंच कर सबके उतरने पर और विमान खाली होने के बावजूद में विमान से नहीं उतरा, वही आगे आकर सीट पर बैठ गया। मैंने कहा जब तक मुझे रसीद वाली शिकायत पुस्तिका नहीं मिलेगी मैं विमान से नहीं उतरूंगा। मुझे लगा कि अब वह पुलिस को बुलाएँगे लेकिन मैं हर स्थिति के लिए तैयार था । आखिरकार उन्होंने वरिष्ठ अधिकारियों से मेरी बात करवाई। तब मैं विमान से उतरा और उनके पास जाकर मैंने कहा कि मुझे शिकायत पुस्तिका दें । उन्होंने मुझसे चाय – पानी पूछा लेकिन मैंने कहा मुझे तो शिकायत पुस्तिका चाहिए।‘

अतुल कोठारी बताते हैं कि आखिरकार शिकायत लिखी गई और उन्होंने 15 दिन में उत्तर देने का आश्वासन भी दिया गया। उसका परिणाम यह हुआ कि जो पायलट केवल अंग्रेजी में सूचना देने पर आमादा था उसने अपने इस कृत्य के लिए लिखित माफी मांगी और भविष्य में हिंदी में जानकारी देने की बात भी कही। इस प्रकार अन्यत्र स्थानों पर भी आवाज उठाई । इस प्रकार भारतीय भाषाओं के स्वाभिमान और प्रतिष्ठापन का कार्य आगे बढ़ता गया।

‘सबसे जरूरी था जन जागरण करना और अपनी भाषाओं को लेकर लोगों के मन में जिस प्रकार के भ्रम और संदेह हैं उन्हें दूर करना । इसके लिए तार्किक एवं वैज्ञानिक दृष्टि से प्रस्तुत आलेख व शोध पत्र आदि प्रकाशित करवाए गए, क्योंकि वैज्ञानिक और तार्किक दृष्टि से ही भ्रम दूर कर के बदलाव लाया जा सकता है।  

                       

भारतीय भाषाओं के इतने व्यापक कार्य को अकेले करना बहुत कठिन था। इसलिए यह सोचा गया कि भारतीय भाषाओं के कार्य को आगे बढ़ाने के लिए अन्य संस्थाओं को भी इस अभियान में साथ जोड़ा जाना चाहिए।  लेकिन मैंने यह पाया कि भारतीय भाषाओं के लिए संघर्षरत ज्यादातर लोगों में और संस्थाओं में कहीं ना कहीं निराशा व्याप्त थी क्योंकि ज्यादातर मामलों में कोई सफलता नहीं मिल पा रही थी।  राजभाषा हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं के उत्थान और प्रसार के लिए संस्था द्वारा लगभग 10 पत्र प्रतिदिन भेजे जाते हैं । इसके चलते धीरे-धीरे कई अच्छे परिणाम सामने आने लगे। रेलवे के मीनू से लेकर छोटी-बड़ी काफी चीजें जो अंग्रेजी में थीँ वे हिंदी अथवा द्विभाषी होने लगीं।

2011 में सरकार द्वारा जिस प्रकार के निर्णय लिए गए उसके कारण हिंदी माध्यम से संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षा देने वालों के परिणाम में भारी कमी आई। इसे लेकर हमने उच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर की । इस प्रकार हमने और भी कई मामलों में जीत हासिल की जनता को न्याय जनता की भाषा में मिले इसके लिए भी निरंतर प्रयास किया जा रहा है। हाल ही में संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षाओं के लिए हमने युवाओं से कहा कि आपको अपनी लड़ाई स्वयं लड़नी होगी, किसीके भरोसे नहीं । और उसमें भी सफलताएँ मिलीं।‘

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