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जिनागम पत्रिका अप्रैल २०१७ सम्पादकीय

महावीर ज न्म कल्याणक पर्व हर साल मनाते हैं
पर महावीर के संदेश को कितना आत्मसात कर पाते हैं
तीर्थंकर महावीर का जन्म कल्याणक पर्व हर ‘जैन’ मनाता है, जगह-जगह कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है, पूजा-पाठ, आरती-प्रच्छाल आदि किए जाते हैं, हर जैन कहता है कि हम महावीर के पुजारी हैं, महावीर एक हैं, महावीर के संदेश हमारे हैं, महावीर हमारा है और हम महावीर के हैं इसलिए महावीर हमारे भगवान हैं, हम आत्मीयजन मिल कर महावीर का जन्म कल्याणक पर्व मनाते हैं।
महावीर ने हम जीवों को अहिंसा का पाठ पढ़ाया और कहा कि किसी भी प्राणीमात्र का वध ही हिंसा नहीं है बल्कि किसी की आत्मा को दु:ख पहुँचाना भी हिंसा है और आज हर दूसरा यह कर रहा है, हर एक में एक ही बात रहती है कि मैं जो कर रहा हूँ वो ही सही है, दूसरे के विचारों का जानना तो छोड़ सुनने को तैयार नहीं होते, क्योंकि आज हर एक ‘अहम’ नाम के जहर को पिया हुआ है जबकि महावीर ने तो अपने संदेश में मात्र केवल ‘अर्हम’ की ही बात की है।
त्याग व तपस्या का दूसरा नाम अहिंसा है, हर वो महावीर है वीर तो वही होता है जो अपनी आत्मा के विचारों में शुद्धता लाये।
हम-सभी विशाल कार्यक्रम जरुर आयोजित करें, मंच पर माला भी जरुर पहनें पर शुद्धता की माला, आत्मनिखार मणियों की माला, पर वह कहां मिलेगी? महावीर के चरणों में…
आइये आत्मसात करें ९ अपै्रल २०१७ को, तीर्थंकर महावीर के जन्मकल्याणक पर्व पर, बतादें दुनिया को हम स्वयं जीयेगें और सब को सुखी देखकर खुश भी होंगे और कहेंगे कि ‘सर्वभव खुश रहे’, यदि ऐसी भावना हम अपना लें तो ही हम ‘जैन’ महावीर के अनुयायी कहलाने के हकदार होंगे।
आइये हम सब सर्वप्रथम स्वयं को आत्मसात कर वीर बनें, मिलकर ‘जैन’ बनें ना कि श्वेताम्बर-दिगम्बर!
मुझे भगवान महावीर ने मौका दिया, कलम की स्याही ने ‘अहिंसा’ लिखना सिखाया, मैं प्रयासरत हूूँ कि महावीर के संदेश को पूरी दुनिया में पहुँचा कर विश्व को अहिंसामयी बनाऊँ, हर कोई स्वयं के साथ अन्यान्यों को भी खुश रखें और मिलकर महावीर जन्म कल्याणक पर्व मनायें, जैन बनें, ऐसी मंगल भावना के साथ, जय जिनेन्द्र!!!

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