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जिनागम पत्रिका फरवरी २०१७ सम्पादकीय

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कर सके तो जरूर करें ये कार्य
हम जैन हैं, अपरिग्रह के पुजारी हैं, अर्हम की राह पर चलने को हमें, हमारे गुरू-भगवंत बताते हैं परंतु हम कितना चल पाते हैं या चलते हैं, ये हमें सोचना चाहिए। कारण यह है कि हम सभी महावीर को तो मानते हैं पर उनके बताए/समझाए राह पर कितना चलते हैं, यह हमें समझने की आवश्यकता है। आज जैन समाज बिखरा पड़ा है, दु:ख इस बात का है कि हर कोई चाहता है कि हम केवल ‘जैन’ कहलायें, फिर भी पंथवाद, आखिर क्यों? समस्त जैन समाज यदि चाहे तो वो देश का सम्मान विश्व में बढ़ जाये, ‘हिंदी’ को हम राष्ट्रभाषा का सम्मान दिलवायें।
जानते हैं दोस्तों! आज हमारे देश की कोई राष्ट्रभाषा नहीं है, जबकि विश्व के हर राष्ट्रों की अपनी-अपनी राष्ट्रभाषाएं हैं, केवल भारत की नहीं, जबकि अपने भारत की सांस्कृतिक भाषा ‘हिंदी’ है जो कि राष्ट्रभाषा की अधिकारिणी है। हमारे पूर्वजों ने राष्ट्र की आजादी के लिए अपना जीवन न्यौछावर किया है, आज राष्ट्र को जरूरत है, अपनी संस्कृति की रक्षार्थ सिपाहियों की। याद रखिए, हमने प्राकृत भाषा नहीं बचाई जिससे हमारे गुरू-भगवंतों द्वारा लिखित कई ग्रंथ जो प्राकृति में लिखे हुए हैं, वो आज हमारे पढ़ने लायक नहीं है।
आज हमारे गुरू-भगवंत अपनी-अपनी भावनाएं लिखकर ‘हिंदी’ में बड़े-बड़े ग्रंथ लिखते हैं जबकि आजकल के बच्चे ‘हिंदी’ पढ़ते ही नहीं तो आगामी २५ सालों में हिंदी ग्रंथों को पढ़ने वाले ही नहीं रहेंगे तो हमारे आदर्श ग्रंथों का क्या होगा?
२३ मार्च २०१७ को मेरे अभियान की सफलतम पूर्णता के लिए साथ दें…
“India gate” का नाम भारत द्वार लिखवायें’’
यदि हमारी भारतीय संस्कृति के भविष्य को संवारे रखना है तो हमें ‘हिंदी’ राष्ट्रभाषा बने अभियान को सफल बनाना ही होगा।
जय जिनेन्द्र

आपका अपना
जैन एकता का सिपाही
-बिजय कुमार जैन

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