जिनागम पत्रिका मई २०१७ सम्पादकीय

मेरे व समस्त जैन समाज के आराध्य महाश्रमण जी के जन्म पर्व पर उनके पावन चरणों में कोटि-कोटि नमन!
तेरापंथाचार्य मेरे गुरुदेव- आराध्य महाश्रमण जी के जन्म पर्व पर इतना ही कहूँगा कि महाश्रमण जी जैसे गुरुवर यदि जिन शासन में मात्र ‘पांच’ की संख्या मुझे मिल जाए, जैन समाज संगठित ही नहीं होगा, जैन समाज व तीर्थंकर महावीर की अहिंसा से भारत ही नहीं विश्व भी नहलायेगा।
गुरुदेव महाश्रमण जी के बारे में, मैं जितना भी लिखूँ, मेरी कलम कभी नहीं थक सकती, कारण यह है कि जब भी मैंने गुरुदेव के दर्शन किए हैं उनकी हथेलियाँ ही नहीं, हाथों की दसों अंगुलियों ने मुझे आशीर्वाद दिया और कहा कि बिजय आगे बढ़ो, जैन समाज एकत्रित करने का प्रयास करते रहो, एक दिन सफलता जरुर मिलेगी।
विश्वास करें! गुरुदेव महाश्रमण की मूरत मेरे दिल व दिमाग में बसी रहती है क्योंकि जब भी मैंने उनके दर्शन किये, एक ही बात गुरुदेव कहते कि जैन श्रावक के साथ अहिंसायुक्त योद्धा बनों, जिन शासन की प्रभावना करो, तुम जैन हो, तुम्हारी ‘जैन एकता’ की भावना को मेरा आशीर्वाद है।
गुरूदेव ने गत महावीर जयंती पर पावापुरी- नालंदा में ‘जैन एकता’ के लिए कई मील की दूरी तय कर, चारों संप्रदाय के गुरु भगवंत के साथ, हजारों की संख्या की जनमेदिनी के समक्ष कहा कि हम सभी (अलग-अलग पंथी) जब महावीर को मानते हैं, पुजते हैं, प्रात: स्मरणीय होते हैं फिर क्यों न ‘जैन’ बनें, हमारे ‘पंथ’ हमारे घर में रहें, पर समाज या देश के लिए हम ‘जैन’ बनें।
‘जैन एकता’ मेरे जीवन का स्वप्न है, देख पाऊँगा या नहीं कह नहीं सकता, कारण क्या-क्या बताउँâ, किस-किस को सुनाऊँ, मुझे महाश्रमण जैसे आचार्य की तलाश है, महावीर को कहाँ से लाऊँ, वो नहीं मेरे आस-पास है।
आचार्य तुलसी-नानालाल जी-आनंद ऋषि जी जैसे त्यागी की उपस्थिति ही मेरी आस है क्योंकि ऐसे आचार्यों की मानसिकता नहीं मेरे पास है।
मेरा राष्ट्रहित अभियान”  बनें भारत की राष्ट्रभाषा अभियान’ के लिए समस्त भारत वासियों के साथ जिन शासन के सभी गुरु-भगवंत व श्रावक-श्राविकाआें, का साथ-सहयोग-मागर्दशन मिलेगा, भारत की भाषाई संस्कृति का भविष्य सुदृढ़ होगा, ऐसा मुझे विश्वास है। जय जिनेन्द्र!!!

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