राष्ट्रभाषा : मनन, मंथन, मंतव्य – संजय भारद्वाज भाग – 2

भारत सरकार तथा मॉरीशस की सरकार के बीच सम्पन्न द्विपक्षीय करार के अनुसार विश्व हिन्दी सचिवालय का प्रथम महासचिव मॉरीशस से होगा और इसका कार्यकाल 3 वर्ष का होगा । तद्नुसार मारीशस से डॉ.(श्रीमती) विनोद बाला अरूण की विश्व हिन्दी सचिवालय की प्रथम महासचिव के रूप में नियुक्त की गई है ।

उपमहासचिव

भारत सरकार तथा मॉरीशस की सरकार के बीच सम्पन्न द्विपक्षीय करार के अनुसार विश्व हिन्दी सचिवालय का प्रथम उपमहासचिव भारत से होगा और इसका कार्यकाल 3 वर्ष का होगा । तद्नुसार भारत से डॉ. राजेन्द्र प्रसाद मिश्र की विश्व हिन्दी सचिवालय के प्रथम उपमहासचिव के रूप में नियुक्त की गई हैं । विश्व हिन्दी सचिवालय ने 11फरवरी 2008 से औपचारिक रूप से कार्य करना आरंभ कर दिया है।

भाषा और संस्कृति

अब विदेशों में हमारे प्रवासी भारतीय अपनी भाषा संस्कृति, आदर्श एवं मूल्यों के प्रबल समर्थक होते हुए भी विदेशी भाषा को अपनी आजीविका तथा वैज्ञानिक उन्नति का स्त्रोत एवं साधन मानकर उसकी उपासना में लगे हुए हैं। ऐसी स्थिति में उन्हें अब आत्म विश्लेषण करना होगा कि हम मूलत: भारतीय हैं और भारत गणतंत्र की राजभाषा, संपर्क भाषा एवं राष्ट्रभाषा हिन्दी की उपेक्षा करना उचित नहीं हैं। यह जागृति व चेतना पुन: हिन्दी के उत्थान में सहायक सिध्द होगी।

भाषा मानव मन की भावनाओं को अभिव्यक्त करने का साधन है। साथ ही एक-दूसरे को जोड़ने का माध्यम है। परस्पर सुख-दुखों आशा-आकांक्षाओं, आचार-विचार, वेष-भूषा, ज्ञान-विज्ञान, कला समस्त प्रकार की भाव संपक्ष आध्यात्मिक विरासत, संस्कृति तथा समस्त चिंतन भाषा में निबद्ध होता है।

वैदिक संस्कृत एवं ग्रीक भाषा एवं साहित्य विश्व के अत्यंत प्राचीनतम एवं समृद्ध भाषाएँ मानी जाती हैं। जिस भाषा में ज्ञान-विज्ञान, शिल्प एवं समस्त कलाओं की अभिव्यक्ति की गहनक्षमता होती है, वह भाषा संपन्न मानी जाती है। गुरुदेव रवीन्द्रनाथ  ठाकुर ने अपने एक गीत में स्पष्ट बताया है- हम देश में आर्य भी आये। अनार्य भी आए,द्रविड़, चीन, शक-हूण, पठान मुगल सभी यहाँ आये, लेकिन कोई भी अलग नहीं रहा। सब इस महासागर (संस्कृति)में विलीन होकर एक हो गये।

निश्चय ही भारत एक महासागर है और भारतीय संस्कृति भी महासागर है। इसमें विश्व की तमाम संस्कृतियाँ आकर समाहित हो गई। आज जिसे लोग हिन्दू संस्कृति मानते है वह वस्तुत: भारतीय संस्कृति है जो सिंधुघाटी की सभ्यता, प्राग्वैतिहासिक एवं वैदिक संस्कृति का विकसित रूप है। इसने अनेक धर्मों, सभ्यताओं एवं संस्कृतियों को आत्मस सात कर लिया है। यही कारण है कि भारतीय संस्कृति सामासिक कहलाती है।

भारतीय संस्कृति की अन्य विशेषताएँ है। यह प्रगतिशील है, सांप्रदायिकता से परे तथा सहिष्णुता की भावना से ओतप्रोत है। समस्त भारत को धार्मिक, सामासिक  सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक स्तर पर एक सूत्र में गूँथने की भावना एक भारतीय भावना-एकात्म भावना में बदरीनाथ केदारनाथ से लेकर कन्याकुमारी को, काशी से रामेश्वरम द्वारका से पुरी को जोड़ रखा है। जगद्गुरु श्री शंकराचार्य ने भारत के चारों दशाओं में चार पीठों की स्थापना की। तुलसी के अयोध्यावासी राम रामेश्वरम में शिव की उपासना करते हैं।

धार्मिक स्तर पर भी समन्वय की भावना भारतीय संस्कृति की महान उपलब्धि है। भारतीय वाडमय भी सांस्कृतिपरक है। डॉ. पी. राघवन ने अपनी भारतीय साहित्य रत्नमाला पुस्तक मे बताया है- भारत की प्रादेशिक भाषाओं में उत्कृष्ट साहित्य के प्रथम प्रयास संस्कृत के अनुवाद मात्र ही थे। ये सभी भाषाएँ शब्दराभि, दार्शनिक एवं धार्मिक पृष्ठभूमि, विषयवस्तु और साहित्यिक शैलियों के लिए संस्कृत पर ही पूरी तरह आश्वित थी।

यह कथन सर्वथा सत्य है हमारे देश की प्राकृत, पालि अपभ्रंश, ब्रज अवधी राजस्थानी भाषाएँ ही यहीं अपितु बांगला,मराठी, गुज़राती, तेलगु, कन्ड़, मलयालम आदि इतर भाषाएँ भी अपनी साहित्यिक संपदा के लिए किसी न किसी रूप में संस्कृत पर आधारित रही हैं अर्थात् समस्त भारतीय भाषाएँ संस्कृत वाडमय से अनुप्राणित हैं। महर्षि वाल्मिकी कृत आदि काव्य रामायण से लेकर व्यास प्रणीत महाभारत, भागवत इत्यादि काव्य-ग्रंथों के साथ भास,बाणभट्ट, हर्ष, कालिदास आदि के द्वारा विरचित साहित्य भारतीय भाषाओं में रूपांतरित है और उसके विभिन्न उपाख्यानों के आधार अपने पाडमय भण्डार को संपन्न कर चुकी है और यह क्रम भी जारी है।

अलावा इसके संस्कृत में भारती दर्शन, वेदांत, उपनिषद, तर्क, व्याकरण, न्याय रसायन, इतिवास, चिकित्सा,अर्थशास्त्र, नीतिशास्त्र, ज्योतिष, गणित, धनुर्वेद, मीमांसा, पुराण इत्यादि ज्ञान-विज्ञान संबंधी समस्त साहित्य उपलब्ध है जिसका रूपांतर समस्त भारतीय भाषाओं में हुआ है और ये सारी  क्षेत्रीय भाषाएँ उपरोक्त वाड:मय के लिए केवल संस्कृत पर ही प्रारंभ में आधारित रहीं जिसमें हमारी संपूर्ण सांस्कृतिक परंपरा अक्षुण्ण है। अर्थात् संस्कृत भारतीय संस्कृति की स्त्रोत भाषा रही है और संस्कृत साहित्य उसका मूलाधार रहा है।

दरअसल किसी देश की सभ्यता एवं संस्कृति के विकास में उस देश या राष्ट्र की भाषा अहम् भूमिका रखती है। वैदिक युग से लेकर मुगल एवं अँग्ररेज़ों के आगमन तक भारत का इतिहास भाव्य रहा है। इस महान देश की सभ्यता की तूती सारे विश्व में बोल रही थी। भारत सभी क्षेत्रों में अ ग्रिम पंक्ति में था। रोम, ग्रीक आदि देशों के साथ भारत का व्यापार आदि वाणिज्य के क्षेत्रों में गहरा संपर्क था। बौद्ध एवं जैन युगों के समय में भारत की शिल्प स्थापत्य,चित्रकला एवं काष्ठकला चरमसीमा तक पहुँच चुकी थी। विदेशों से विद्यार्थी यहाँ के तक्षशिला, नालन्दा तथा विक्रम शिला के विश्व विद्यालयों में शिक्षा पाने हेतु आया करते थे। यहाँ की राज दरबारों में विदेशी राजदूत नियुक्त थे। मेगस्थनीस, टालमी, विदेशी यात्रियों ने हमारे देश का भ्रमण करके जो यात्रा वृतान्त लिखे हैं, उससे हमारे देश के प्राचीन वैभव एवं संस्कृति का भली भाँति पता चलता है। ईस्वी पूर्व पाँचवी शती से लेकर ईस्वीं दसवीं शताब्दी तक भारत के क्षेत्रों में स्पृहणीय विकास को प्राप्त था। इस प्रकार हमारे देश के चतुमुखी विकास में भाषा एवं साहित्य अगुणी भूमिका निभा रहे थे। दो हजार वर्ष पूर्व भारत में जहाँ न्यायी एवं पराक्रमी सम्राट विक्रमादित्य का वैभवपूर्ण  शासन था, चन्द्रगुप्त जैसे प्रतापी और चाणक्य जैसे कुशल राजनीतिज्ञ विश्व के इतिहास में दुर्लभ हैं। महामात्य चाणक्य ने राज्य व्यवस्था चलाने के लिए अर्थशास्त्र, नाम से एक अद्भुत राजनीति शास्त्र का प्रणयन किया था,जिससे भारत की शानदार राज्य व्यवस्था का पता चलता है। परन्तु यवनों के आक्रमण के पश्चात् क्रमश: हमारे शास्त्र वाड:मय  एवं कलाओं के विकास का मार्ग अवरूद्ध हुआ। अँग्ररेज़ों के आगमन के साथ हम अपने धर्म-कर्म को भी भूल बैठे और पाश्चात्य रंग में रंगने लगे। लार्ड मेकाले ने भारत में शासन तंत्र एवं शिक्षा का माध्यम अँगरेज़ी बनाने के सिफ़ारिश करके भारतवासियों को इंग्लैण्ड का बौद्धिक  गुलाम बनाया। आज हम उसी भाषा के चश्मे से दुनिया को देखते हैं और अपनी अस्मिता को खो बैठे हैं। हमारे देश की सुद्र भाषाओं पर हमारा विश्वास नहीं रहा। पाश्चात्य सभ्यता के प्रवाह में बहते हुए भाषा के स्तर पर पराश्रित बन गये हैं। कुछ लोगों का विश्वास है कि विश्व का समस्त ज्ञान-विज्ञान एवं प्रतिभा कौशल केवल अँगरेज़ी भाषा में सुरक्षित है। यह उनकी गलत धारणा है। पुरातत्व  फलां संगीत चित्रकारी इत्यादि विषयों में फे्रंच भाषा में जैसा समृद्ध साहित्य उपलब्ध है, वैसा साहित्य अँगरेज़ी में नहीं है फिर हम लोग अँगरेज़ी के बैशाखी पर चलते में गौरव तथा वर्ग का अनुभव करते हैं जब कि यथार्थ में रूसी,जापानी, जर्मन, फ्रेंच एवं फारसी भाषाएँ भी कम समृद्ध नहीं है। इन भाषओं  में प्रचुर मात्रा में ज्ञान-विज्ञान का साहित्य रचा गया है और महत्वपूर्ण  अनुसंधान हुआ है। उनकी संस्कृति परंपरा इन भाषाएं में अक्षुण्ण है और आज वैश्विक स्तर पर ये देश व्यापर वाणिज्य कला संस्कृति तथा विज्ञान के क्षेत्रों में अग्रिम पंक्ति में है। ये देश किसी भी हानि से अँगरेज़ी के मुंह ताज नहीं है। फिर भारत क्यों अँगरेज़ी का मुखापेक्षी है। यह हमारी मानसिक दासता का द्योतक है।

प्रजातंत्रीय राष्ट्र के चार अनिवार्य तत्वों में- संविधान राष्ट्रध्वज तथा राष्ट्रगीत के साथ राष्ट्रभाषा भी नितांत आवश्यक है। साथ ही किसी भी राष्ट्र पर किसी विदेशी भाषा को थोपना आधुनिकता के मूलभूत सिद्धांतों के विरूद्ध है। वास्तव में यदि किसी राष्ट्र  पर जब कोई विदेशी भाषा हावी होने लगती है तभी उस राष्ट्र की संस्कृति का हास ने लगता है। किसी जाति के पूर्वजों द्वारा विचार एवं कर्म के क्षेत्र में अर्जित श्रेष्ठ संपत्ति उसकी संस्कृति होती है। वह संस्कृति उस जाति की भाषा के माध्यम से जीवित रहती है। सदियों से कोई भी जाति अपने जो मूल्य एवं आदर्श अपने अनुभव श्रमनिष्ठा चिन्तन मेधा समझ, विवेक द्वारा स्थापित करती है। उस जाति की संस्कृति मानी जाती है। भाषा संस्कृति की वाहिका होती है। अर्थात् संस्कृति की आधारशिला उस जाति की भाषा होती है। इसलिए संस्कृति भाषा पर टिकी होती है। इस प्रकार भाषा और संस्कृति का अविभाज्य संबन्ध है।

आज हमारे देश और विदेशों में भी हमारी संस्कृति खतरे में फँसी हुई है। विरासत को भूल बैठे हैं और अंधाधुंध पाश्चात्य भाषाओं साहित्य, कला, रहन-सहन आचार-विचार, संप्रदायों का अनुकरण करते जा रहे हैं, पाश्चात्य सभ्यता के आदर्श एवं मूल्य भौतिक सुख-सुविधाओं पर टिके हुए हैं और बौद्धिक विकास को प्रश्चय देते है। जबकि हमारे आदर्श एवं मूल्य निशुद्ध अध्यात्मपरक हैं। यह आदर्श तथा मूल्य भारतीय भाषाओं में सुरक्षित हैं। अब विदेशों में हमारे प्रवासी भारतीय अपनी भाषा संस्कृति, आदर्श एवं मूल्यों के प्रबल समर्थक होते हुए भी विदेशी भाषा को अपनी आजीविका तथा वैज्ञानिक उन्नति का स्त्रोत एवं साधन मानकर उसकी उपासना में लगे हुए हैं। ऐसी स्थिति में उन्हें अब आत्म विश्लेषण करना होगा कि हम मूलत: भारतीय हैं और भारत गणतंत्र की राजभाषा, संपर्क भाषा एवं राष्ट्रभाषा हिन्दी की उपेक्षा करना उचित नहीं हैं। यह जागृति व चेतना पुन: हिन्दी के उत्थान में सहायक सिध्द होगी।

आज वैश्विक स्तर पर हिन्दी को एक प्रकार से मान्यता प्राप्त हो चुकी हैं। दूतावासों के माध्यम से ही नहीं अनेक विश्वविद्यालयों में हिन्दी के पठन-पाठन तथा अनुसंधान की व्यवस्था हो चुकी है। हिन्दी भाषा भाषी ही नहीं, अन्य समस्त भारतवासी विदेशों में निवास करते हुए यह अनुभव करते हैं कि वे अपनी संस्कृति व अस्मिता खोते जा रहे हैं,यह अनुभव और आत्मविश्लेषण हिन्दी को अपनाने तथा जीवित बनाने रखते का शुभ संकेत है। यत्र-तत्र वे हिन्दी को द्वितीय भाषा के रूप में पाठशालाओं में पढ़ाने की व्यवस्था कराने के लिए आकुल-व्याकुल हैं।

मेरी समझ में विदेशों में हिन्दी को स्थापित करने तथा उसके उत्थान के उपायों हो सकते हैं :

  1. प्रत्येक परिवार में माता-पिता या अभिभावक अपनी मातृभाषा या हिन्दी में ही वार्तालाप करें और बच्चों के साथ घर में सदा-सर्वदा हिन्दी में ही बोले अर्थात हिन्दी का वातावरण बनाये रखें।
  1. प्रवासी भारतीय विदेशों में जहाँ भी रहें, जिस स्थिति में भी रहें, भारतीय संस्कृति के आदर्शों  तथा मूल्यों से पूर्ण साहित्य का पठन-पाठन करें व करायें।
  1. विदेशों में बच्चों के लिए हिन्दी पाठशालाओं में हिन्दी पढ़ाने का प्रबंध करावें। चाहे द्वितीय या तृतीय भाषा के रूप में ही क्यों न दो पाठयक्रम में स्थान दिलावें।
  1. भारतीय बहुल नगरों शहरों व कस्बों में हिन्दी ग्रंथालय तथा वाचनालय स्थापित करें, प्रमुख पत्रिकाएँ मंगवाकर सब को सुलभ करावें। हिन्दी में रचित उत्तम साहित्य तथा विज्ञान संबंधी पुस्तकें मंगवायें अथवा दूतावास के माध्यम से उपलब्ध करावें।
  1. भारतीय पर्व व त्यौहार अवश्य निष्ठापूर्वक मनाकर उनके महत्व पर व्याख्यानों का आयोजन करें।
  1. हिन्दी की विविध विधाओं पर प्रतियोगिताएँ चलाएँ तथा विजेताओं  को पदक पुरस्कार प्रदान कर प्रोत्साहित करें।
  1. समय-समय पर गोष्ठियों, परिसंवादों, समारोहों, सम्मेंलनों तथा सभाओं का आयोजन करके अपने ज्ञान की वृद्धि करें और हिन्दी भाषा के प्रतिममत्व आकर्षण तथा श्रद्धा-भाव पैदा करें।
  1. विभिन्न भारतीय भाषाओं तथा साहित्यों के आदान प्रदान-अनुवाद इत्यादि का प्रबंध हो। ताकि विभिन्न भाषा भाषी भारतीयों के बीच सद्भाव, सौमनस्य एवं सौजन्य के अंकुर फूटे।
  1. पिकनिक, सांस्कृतिक कार्य भी संगीत, नृत्य नाटक एवं चित्रकलाओं के प्रदर्शन भी हिन्दी के उत्थान में सहायक हो सकते हैं।
  1. इन सब से बढ़ कर महत्वपूर्ण कार्य यह होना चाहिए कि दादी-नानी के माध्यम से ही नहीं, माता-पिता तथा भारतीय समाज के लोग भारतीय साहित्य, कला, वैभव, इतिहास आदि का बच्चों के बोध करावे तथा अपनी मातृभूमि प्रति श्रद्धा-भक्ति उनके हृद्यों में  उदित हो सके।   तेलुगु के महा कवि आचार्य रायप्रोलु सुब्बाराव ने अपने एक राष्ट्रीय गीत में यह उद्बोधन किया है- (देश मेगिनाएवं कालिडिना, पोगडरा भी तल्ली भूमि भारतीनी। अर्थात् तुम किसी भी देश में जाओ, जहाँ भी कदम रखें, अपनी मातृसदृश भारत भूमि की प्रस्तुति करना न भूलो।)

अब रहा, भारत के भीतर हिन्दी के उत्थान का प्रश्न-हिन्दी तो संवैधानिक स्तर पर 26जनवरी 1956 से ही भारत की राजभाषा का स्थान व गौरव प्राप्त कर चुकी है। अँगरेज़ी सहभाषा के रूप में व्यवहत्त होनी चाहिए थी परंतु आज भी उसका वर्चस्व सर्वत्र स्थापित है। यह हमारी मानसिकता की गुलामी का प्रतीक है। गृह मंत्रालय द्वारा हिन्दी को क्रमश: शासन तंत्र में अर्थात प्रशासन में प्रवेश कराने के प्रयत्न दशकों से हो रहे हैं, जो संतोष जनक नहीं है वैसे 1965में तत्कालीन प्रधान मंत्री स्वर्गीय श्री लालबहादुर शास्त्री की अध्यक्षता में संपन्न मुख्यमंत्रियों के सम्मेलन में सर्वसम्मति से सभी राज्यों में त्रिभाषा सूत्र अमल करने का निश्चय हुआ था- प्रथम भाषा- मातृभाषा या क्षेत्रीय भाषा,द्वितीय भाषा हिन्द या तृतीय भाषा के रूप में अँगरेज़ी पढ़ाई जाए। दक्षिण के आन्ध्रप्रदेश, कर्नाटक एवं केरल ने ईमानदारी के साथ इस सिद्धांतों पर अमल किया परंतु शेष राज्यों ने या तो आंशिक रूप में अनुपालक किया अथवा उपेक्षा की। इस क्रम से हिन्दी वास्तव में राजभाषा के पद पर सही मान में कभी स्थापित नहीं हो सकती। इसके दो ही उपाय है- एक तो यह है कि अँगरेज़ी के समान हिन्दी में उत्तीण स्नातकों को नौकवियों में प्राथमिकता दी जाए। यह प्रावधान शासन के स्तर पर विधयक द्वारा होना चाहिए। क्योंकि हिन्दी को आज भावना के स्तर पर नहीं, रोजी-रोटी के साथ जोड़ना होगा। तब झखमार कर तब लोग हिन्दी पढ़ेंगे-सारे देश का समर्थन हिन्दी को प्राप्त होगा और अँगरेज़ी अपने आप छूट जाएगी। दो -संसद में यह प्रस्ताव पारित करना चाहिए कि पाँच या छ: वर्ष की अवधि तक भारत में प्रशासन में अँगरेज़ी का प्रचलन होगा। तत्पश्चात केवल मात्र हिन्दी का प्रचलन होगा अन्यथा हमारी संकल्पना कभी आचरण में साध्य न होगी।

हमारे रासू के मनीषी विद्वान स्वर्गीय डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने सही कहा था कि भारतीय वाङमय एक है और यह विभिन्न भाषाओं में सृजित है। यह हमारी एकात्मता का द्योतक है साथ ही उन्होंने यह भी कहा था कि हमें भारतीय अध्यात्म को पूर्ण रूप  में बनाये रखते हुए पश्चिम के वैज्ञानिक उन्मेष को भी अपनाना होगा। तभी हमारा भौतिक एवं अध्यात्मिक स्तर पर समग्र विकास संभव है। परंतु आज हम भारतीयों में कथनी-करनी में बहुत बड़ा अंतर आ गया है। परिणाम स्वरूप हम इस  संक्रांति काल से गुज़र रहे हैं। इस ओर हिन्दी के महा कवि, कामायनी कार  श्री जयशंकर प्रसाद ने संकित किया था-

ज्ञान दूर कुछ, क्रिया भिन्न है, इच्छा पूरी हो मन की; एक दूसरे से न मिल सके, यह विडम्बना है जीवन की। आइये,हम इस विडंबना पर विजय प्राप्त करें तथा महात्मा गाँधी के इस कथन को-

एक राष्ट्रभाषा हो भारत की।

एक हृदय हो भारत जननी।  सार्थक बनाने का संकल्प करें और  उसे पूर्ण रूप में आचरण  में लावें।

हिंदी में वैज्ञानिक-तकनीकी शिक्षण और चुनौतियाँ

हिंदी अपनी वैश्विक पहचान बनाने की दिशा में तेज़ी के साथ बढ़ रही है। लेकिन तकनीकी और वैज्ञानिक शिक्षण की दिशा में अनेक स्तुत्य प्रयासों के बावजूद अभी भी बहुत कुछ करना शेष है। चीन, जापान, जर्मन,फ्रांस और रूस जैसे अनेक देशों में राष्ट्रभाषा में कर सका है। हमारे यहाँ अँगरेज़ी का रोना रोया जाता है। गुलामी एक बड़ा कारण रही है। आज भी हमारा तंत्र अँगरेज़ी के दुष्चक्र से बाहर नहीं निकल सका है। इसीलिए यह कह दिया जाता है, कि यहाँ हिंदी में तकनीकी या वैज्ञानिक शिक्षण नहीं हो सकता । जबकि ऐसा बिल्कुल नही हैं। हमारे भाषाविदों ने इस चुनौती को स्वीकार करके वर्षों पहले इस दिशा मे महत्वपूर्ण कार्य शूरू कर दिया है। डॉ. रघुवीर और उनके जैसे बहुत से लोंगो ने शुरुआत की, तो अरविंदकुमार जैसे एकनिष्ठ महानुभावों ने उस कार्य को और आगे बढ़ाया । लेकिन दिक्कत यही है कि तकनीकी शिक्षण के नाम पर जो अनुवाद हो रहा है, जो शब्द गढ़े जा रहे हैं, वे इनते क्लिष्ट हैं, कि उनको ग्राह्रा कर पाना संभव नहीं हो पा रहा। चुनौती यही है, कि हमारे भाषाविद् अँगरेज़ी के बरक्स ऐसे नए-नए शब्द सर्जित करें,जो  बेहद आसान किस्म के हों। राजभाषा के रूप मे ही अनेक शब्दों की सर्जना हुई है, वही लोगों के समझ में नहीं आते। वे उच्चारण की दृष्टि से भी बेहद कठिन हैं। फिर भी उन्हें प्रचलन में लाने की कोशिश हो रही है, जबकि शिक्षण के लिए सरल शब्दों के लिए और अधिक कठिन साधना ज़रूरी है। एक तरफ़ पूरा मीडिया हिंग्लिश अथावा हिंगरेज़ी नामक नई भाषा विकसित करने पर तुला हुआ है, दूसरी तरफ़ उत्तरआधुनिकता का राग अलापने वाले लोग हैं, जो ऐसी ही वर्णसंकर भाषा पसंद कर रहे हैं। यह अगर एक नई सर्वमान्य संस्कृति होती, तो भी उसे स्वीकृति मिल सकती थी, मगर यह तो विशुद्ध रूप से अपसंस्कृति है। इसे कैसे आत्मसात किया जा सकता है?  ऐसे विद्रूप समय में हिंदी की वैज्ञानिक शिक्षा के मार्ग में चुनौतियाँ हैं । फिर हिंदी हिंदी है। संभावनाओं का ऐसा द्वार जो सर्जनात्मकता के लिए सदैव खुला रहता है।   स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात हिंदी को निरंतर समृद्ध बनाने की दिशा में भाषाविदों अपनी जवानी होम कर दी। आज भी कुछ लोग अपना बुढापा होम कर रहे हैं। इन सबके प्रयासों से ही हिंदी की तकनीकी शिक्षण का मार्ग प्रशस्त हुआ है। हिंदी में अनुवाद के रूप में या अनुसंधान के रूप में अनेक नए शब्दों की सर्जना हुई है, हो रही है, लेकिन अधिकांश मामले में उसकी बुनावट जटिल है, इसे स्वीकारना होगा । शब्द गढ़ने के नाम पर कई बार असफल प्रयास हुए हैं। लोक प्रचलित हो चुके अँगरेज़ी के शब्दों के कठिन अनुवाद अब ग्राह्रा नहीं हो सकते । टाई के लिए कंठलंगोट और कंठभूषण अथवा सिगरेट के लिए श्वेत धूम्रपान दंडिका जैसे शब्द मजाक बन कर ही रह गए। कुछ शब्दों को तो जस का तस आत्मसात करना होगा, मगर जो अन्य शब्दावलियाँ हैं, उनकी सरलता पर काम करने की ज़रूरत है। टेक्निकल को तकनीकी बनाकर हमने उसे लोकप्रिय कर दिया। रिपोर्ट को रपट किया । अल्टीमेटम को अंतिमेत्थम कहा। अलेक्जेंडर सिकंदर बना। अरिश्टोटल अरस्तू हो गया, और रिक्रूट रंगरूट में बदल गया। कई बार भाषाविदों का काम समाज भी करता चलता है। जैसे मोबाइल को चलितवार्ता भी कहा जाता है। भाषाविद् प्रयास कर रहे होंगे कि इस शब्द का सही अनुवाद सामने आए । कोई सरल शब्द संभव न हो सके तो मोबाइल को ही गोद लेने में कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए। पराई संतानों को स्वीकार करके हम उनके नए नामकरण की कोशिश करते हैं लेकिन हर बार सफलता मिल जाए, यह ज़रूरी नहीं।

हिंदी की तकनीकी शब्दावली को समृद्ध करने के लिए यह अति आवश्यक है कि हम सरल अनुवाद की संस्कृति को प्रोत्साहित करते रहें। अनुवाद ही वह सर्वोत्तम प्रविधि है, जो हिंदी के तकनीकी शिक्षण का आधार बनेगी। अनुवाद एक पुल है, जो दो दिलों को, दो भाषिक संस्कृतियों को जोड़ देता है। हिंदी की तकनीकी या वैज्ञानिक-चिकित्सकीय शिक्षण में अनुवाद का अप्रतिम योगदान रहेगा। अनुवाद के सहारे ही विदेशी या स्वदेशी भाषाओं के अनेक शब्द हिंदी में आते हैं और नया संस्कार ग्रहण करते हैं। कोई भाषा तभी समृद्ध होती है, जब वह अन्य भाषाओं के शब्द भी ग्रहण करती चले। हिंदी में शब्द आते हैं और नया संस्कार ग्रहण करते हैं। हिंदी भाषा में आकर अँगरेज़ी के कुछ शब्द समरस होते हैं, तो यह खुशी की बात है। लेकिन इस चक्कर में हमारे मूल शब्द ही हाशिये पर चले जाएँ, तकनीकी शब्दावली सरल होगी, तभी स्वीकार्य होगी। वरना सारी शब्दावलियाँ पुस्तकों तक ही सीमित होकर रह जाएँगी । या फिर उनका हश्र भी संस्कृत भाषा की  तरह हो जाएगा। व्यवहार में अँगरेज़ी ही चलती रहेगी। अनुवाद पत्रिका सदभावना दर्पण का प्रकाशन करते हुए मैंने महसूस किया कि पत्रिका में जो कविता या कहानी सरल भाषा में अनूदित हुई, उस पर तो पाठकीय प्रतिक्रियाओं की भरमार रही, मगर जिन रचनाओं के अनुवाद क्लिष्ट थे, उन पर कोई प्रतिक्रिया ही नहीं आई। इक्का-दुक्का अगर आई भी, तो यही कहा गया, कि सरल अनुवाद पर ध्यान दें।

पिछले कुछ वर्षों में नए-नए शब्द-संसार से गुज़रते  हुए बहुतों ने यह महसूस किया कि हिंदी के तकनीकी शिक्षण में फिलहाल सबसे बड़ी दिक्कत यही है, कि जो नए-नए शब्द गढ़े जा रहे हैं, वे तत्सम-प्रकृति के हैं और क्लिष्ट भी हैं। उनमे सरलीकरण का खाँटी अभाव है। जैसे समय के साथ-साथ शब्द भी आसान होते चलते हैं, तद्भवी रूप लेते रहते हैं, उसी तरह तकनीकी शब्दों को भी थोड़ा आसान बनाना होगा। जिव्हा से जीभ, वृच्श्रिक से बिच्छू, अक्षि से आँख,स्तन से थन, कोकिल से कोयल और इंतकाल का रूपांतरण अंतकाल सचमुच  सरल और व्यावहारिक लगता है। लेकिन संस्कृत या अंगरेजी़ के कुछ शब्दों का हिंदीकरण करने के चक्कर में उसे और ज़्यादा क्लिष्ट बना देना अन्याय ही है। जैसे अपमार्जिका को अपमार्जक जंतु, उरका को सरीसृप जीव कहना मूल शब्द से एक तरह का खिलवाड़ ही लगता है। संस्कृत के अतिचित्र को कैरिकेयर और प्रक्षेपित्र को प्रोजक्टर के विकल्प रूप में रखना तो सुखद लगता है, मगर मीसोन को मध्योण, पोजीट्रोन को धनोण, न्यूट्रोन को नपुंसोण और ऐक्स क्रोमोसोम का अक्षसोप या अक्षोम नामकरण शिक्षण को और दुरूह कर देगा। बेहतर यही होगा कि हम वैज्ञानिक एवं तकनीकी शिक्षण के लिए सरल एवं ग्राह्म हो सकने वाले शब्दों की ही सर्जना करें। जैसे गलूकोज को मधुरोस, प्रोटीन को प्रोथीन, चार्जिक को चार्जन करना ज़्यादा व्यावहवारिक एवं ग्राह्म प्रतीत होता है।

मूल्य शब्दों से परे जाकर अनुवाद करना और और मूल शब्द से मिलते-जुलते शब्दों की सर्जना में अंतर है। शब्दकोश की समृद्धि के लिए दुरूह प्रयोग ठीक हो सकते हैं, लेकिन शिक्षण की दृष्टि से देखें तो ये कतई उपयोगी सिद्ध नहीं हो सकेंगे । जैसे प्रक्षालित्र, उत्थापित्र, प्रोत्थापित्र, प्रदोलित्र, संरोधित्र, श्यानित्र जैसे शब्द लाख कोशिशों के बावजूद छात्र ग्राह्म नहीं कर पाएँगे। इससे बेहतर तो यही होगा कि हम अँगरेज़ी के शब्दों को ही जस का तस रख दें, या फिर रुपांतरण इतना आसान बनाएँ, कि अटपटा न लगे। फ्रिजर का अनुवाद श्यानित्र, एयरकूलर का शीतित्र अथवा वातानुशीतित्र तथा इनवाइटर को इग्रित्र कहना अटपटा प्रयोग लगता है। ऐसा करके हम छात्रों को शिक्षण ही नहीं,हिंदी से भी दूर ले जाएँगे। एयरकूल का वातानुकूल तो ठीक है, लेकिन यह भी स्वीकारना होगा, कि हर युग में और हर कहीं केवल सरलता ही स्वीकार्य होती है। वाल्मीकि द्वारा संस्कृत में रची गयी रामायण संस्कृत के विद्वान तो समझ पाए, लेकिन वह आम लोगों से दूर ही रही, लेकिन जैसे ही तुलसीदास जी ने रामचरित मानस की अवधी जैसी खड़ी बोली में, सर्जना की, तो वह देखते ही वैश्वीक हो गई।

विज्ञान एवं तकनीकी शिक्षण के लिए गढ़े जाने वाले शब्दों के साथ भाषाविद् इस बात का भी ध्यान रखें, कि उसे लोक-स्वीकृति मिले। नए तकनीकी शब्द अगर किताबी बन कर रह गए, तो उनकी उपादेयता क्या रहेगी ? वे हमारे जीवन के भी अनिवार्य हिस्से क्यों न बनें ? नित नए शब्दों के सर्जक दिन-रात एक कर रहे हैं। लैंस को चंद्रक,कार्डियल को हृदयल, पैथसिन के लिए जठरिन, एयर कन्वेटर के लिए परिवत्र या संवाहित्र, और इंक्केरी के लिए परिपृष्टा जैसे शब्दों की सर्जना वंदनीय है लेकिन यह ग्राह्रा नहीं हो सकते। अगर हम ऐसे शब्दों के सहारे शिक्षण करने की तैयारी कर रहे हैं, तो छात्र दूर होते जाएँगे। सरलीकरण का ध्यान रखते हुए शब्द-संधान हो। ऐसे शब्द तैयार हों, जो पानी की तरह बहते हों। नए सृजित शब्दों के अधिकांश उदाहरण मैंने अरविंदकुमार जी के समांतर कोश से ही लिए हैं। अरविंदकुमार जी ने अपनी धर्मपत्नी के साथ मिल कर निसंदेह युगांतकारी काम किया है। हिंदी साहित्य उनका ऋणी है, लेकिन व्यावहारिक दृष्टि से उनके अनेक शब्द शायद अप्रचलित ही रह जाएँगे । शिक्षण-प्रशिक्षण की दृष्टि से उपयोगी सिद्ध नहीं हो पाएँगे। जिस तरीके के शब्द सामने आ रहे हैं, उसे देख कर ही यह माना जाने लगा है कि हमारे यहाँ भी हिंदी में तकनीकी शिक्षण सर्वाधिक जटिल का है।

भूमंडलीकरण के इस दौर में एक भाषा में अन्य भाषाओं के शब्द भी सहज रूप से समरस होने लगे हैं। यह वैश्वीकरण की दिशा में रचनात्मक पहल है। आक्सफोर्ड शब्दकोश में पक्का, अचार, गंगा, पंडा, हिंदी, पंडित जैसे अनेक शब्द शामिल हो चुके हैं। तब हम अँगरेज़ी के बेहद प्रचिलत शब्दों का शिक्षण में इस्तेमाल क्यों नहीं कर सकते ? शब्दों की नई संरचनाएँ स्वागतेय हैं, मगर वे पर्यायवाची के रूप में ही रहें। जैसे ब्लैकहोल को कालत्र कहना या विटामिन के लिए जीवामिन शब्द बनाना ठीक है, लेकिन समीचीन यही होगा, कि हम ब्लैकहोल और विटामिन का ही व्यवहार करते रहे, क्योंकि ये शब्द अब बेहद प्रचलित हो गए हैं। एयरकूल एयरकूल ही ठीक है। इसे वातानुशीतित्र करने से गरमी बढ़ सकती है। मानसिक शीतलता दृष्टि से कठिन शब्दावलियों से परहेज भी ज़रूरी है। तभी तकनीकी शिक्षण सफल हो पाएगा। (क्रमश…) अनेक उदाहरणों को देखने के बाद मैं यह मानता हूँ कि हिंदी में तकनीकी- वैज्ञानिक शिक्षण के लिए नए सिरे सोचने की ज़रूरत है। क्लिष्टता ही विद्वता का पर्याय नहीं है। सरलता ही सर्वकालिक होती है। इस दृष्टि से हिंदी में नई शैक्षणिक प्रविधि विकसित करने की ज़रूरत है। अंतरजाल (इंटरनेट) के माध्यम से हिंदी वैश्विक होती जा रही है। अब उसे शिक्षण-प्रशिक्षण की सार्थक भाषा बनाने के लिए नई परियोजनाएँ बनानी होंगी। बन भी रही हैं। शब्दावली आयोग तो 1961 से ही इसी काम में प्राणपण से सक्रिय है। आयोग ने अब तक लगभग पाँच लाख पारिभाषित शब्दों का जाल-सा बिछा दिया है। मानविकी, विज्ञान, प्रशासन आदि से जुड़े हजारों नए शब्द तैयार हुए। यह अभूतपूर्व काम है। भाषाविदों को भी अलग-अलग मोर्चों पर काम करना पड़ेगा। शर्त यही है, कि अनुसंधान एवं सर्जना के लिए सरल भाषा में ही वैकल्पिक शब्दों की संरचना हो। वह आम बोलचाल की भाषा भी न हो, लेकिन कम से कम ऐसी तो हो, कि विद्यार्थी उसे आसानी से समझ और उच्चारित कर सकें।

अपने समय के महान भाषा विज्ञानी डॉ. रघुवीर, डॉ. भोलानाथ तिवारी, हरदेव बाहरी, फादर कॉमिल बुल्के आदि ने हज़ारों शब्द सर्जित किए थे। डॉ. रघुवीर ने डेढ़ लाख पारिभाषिक शब्दों का भारी-भरकम कोश तैयार किया था। उन्होंने अँगरेज़ी के अनेक शब्दों के हिंदी अनुवाद किए, नए शब्द भी गढ़े, मगर तत्सम रूपों के कारण उन्हें स्वीकृति नहीं मिल सकी, लेकिन उन्होंने युगांतकारी काम किया था, वे शुद्धतावादी थे अब केवल संस्कृतनिष्ठ शब्दों से काम नहीं चलेगा। हमें भारतीय भाषाओं के सहारे शब्दों की रचना करनी होगी। डॉ. रघुवीर के काम को जी-तोड़ श्रम करने वाले अरविंदकुमार जी आगे बढ़ा रहे हैं। लेकिन अनेक शब्द व्यावहारिकता के निकष पर खरे नहीं उतर सके हैं। अभी और मेहनत करनी होगी और विज्ञान-तकनीकी शिक्षण के लिए दुरूह शब्दों के साथ-साथ मूल शब्द भी प्रचलन में रखना होगा। धीरे-धीरे ही सही, क्लिष्ट शब्द भी हमारे शैक्षणिक जीवन के हिस्से बन जाएँगे। ज़रूरत इस बात की है,कि नए शब्द  पर्यायवाची रूप में निरंतर प्रचलन में रहें। इस बात का ध्यान भी रखना होगा, कि अपनी भाषा की श्रेष्ठता का दंभ न पाला जाए। अन्य भारतीय भाषाओं से भी शब्द लेने की कोशिशें हों। संस्कृत को देववाणी कह दिया जाता है। महाराष्ट्र के महान संत नामदेव इसीलिए तो पूछते हैं, कि संस्कृत अगर देववाणी है तो मराठी क्या चोरवाणी है ? दरअसल अस्मिता के नाम पर हमारे हिंदी विद्वान कुछ ज़्यादा ही भावुक और शुद्धतावादी हो गए। यही भावुकता शिक्षण-प्रशिक्षण में बाधा बन रही है।

हिंदी का बृहत्तर समाज अब वैश्विक होता जा रहा है, इसलिए वह शिक्षण के मामले में भी उदार बने। हिंग्लिश या हिंगरेज़ी या अँगरेज़ी का तेज़ी से विस्तार हो रहा है। यह इस बात का प्रतीक है, कि वर्जनाएँ टूट रही हैं। शुद्धता अब कोई अहम् मुद्दा नहीं। अब तो जो हमारी सेवा में तैनात है, उसकी भाषिक प्रविधि को ही निखारने की ज़रूरत है। अँगरेज़ी हमारी जीवन शैली का हिस्सा बनती जा रही है। ऐसे समय में अगर कुछ यौगिक शब्द बनें या अँगरेज़ी शब्दों की सरल अनुसर्जना हो, तो यह स्वागतेय है। जेल-खाना, रेल-गाड़ी, रेलवे, प्लेटफार्म, बस स्टैंड, शेयरधारक, आदि को हम हिंदी को हम हिंदी मानकर चलें। रेडियो, टीवी, भाषा के मामले में हम सर्वग्रह्म प्रवृत्ति के संत बन कर यौगिक एवं सरल शब्दों को प्रोत्साहित करें। ग.मा. मुक्तिबोध ने कहा था, कि राष्ट्रभाषा वही है जिसकी पहुँच ज़्यादा आदमियों तक रहे। किंतु हम तो हिंदी की प्रेषणीयता को ही ख़त्म करने जा रहे हैं। बात बिल्कुल सही है। दुरूह शब्दों को परोसने की कोशिश प्रकारांतर से हिंदी की प्रेषणीयता को ख़त्म कर देगी।

भाषिक संरचना की दिशा में निरंतर अनुसंधान हो रहे हैं इसलिए विज्ञान एवं तकनीकी शिक्षण की शब्दावलियों  के बारे में आम राय यही है कि उनके लोकव्यापीकरण पर ध्यान दिया जाए। जैसे प्रजनन सरल लगता है, मगर उस प्रवर्णन कितना कठिन हो जाएगा। एल्फा के लिए अकाराणु, कन्वैक्टर के लिए पंखित्र जैसे शब्द उचित-से प्रतीत नहीं होते। मेरे ख्याल से हारमोन को हारमोन ही रहने दिया जाए। कन्वेक्टर अगर कन्वक्तर भी हो जाए तो चल सकता है। जैसे रिपोर्ट का रपट हो गया। कार्डियल को हृदयल अनुवाद हृदयग्राही है। ज्ञापन, परमाणु, अणु,रेडियोएक्टिवता, अधीक्षक, निगम, मुदा-स्फीति, प्रायोजित अनुवांशिकी, डाक्टर, इंजीनियर, जैसे अनेक शब्द हैं, जो धीरे-धीरे जीवन में घुल-मिल रहे हैं। मगर लाइटर के लिए प्रज्वलित्र कठिन है। उजालक जैसे विकल्प पर विचार किया जाए। कम्प्यूटर के माउस को माउस ही रहने दें। उसे चुहा न बनाएँ।

बहरहाल, हिंदी में तकनीकी और वैज्ञानिक शिक्षण शिक्षण की दिशा में जो भगीरथ प्रयास हो रहे हैं, वे विफल नहीं हो सकते। वह दिन दूर नहीं जब हमारी राष्ट्रभाषा हिंदी में संपूर्ण तकनीकी शिक्षण शुरू हो जाएगा। बस, हमें  अँगरेज़ी के साथ-साथ भारतीय भाषाओं को भी खंगालना होगा। वहाँ भी हमें अँगरेज़ी के पर्यायवाची शब्द मिल सकते हैं। उर्दू या कहें कि हिंदुस्तानी भाषा के उनके शब्द लिए जा सकते हैं । दक्षिण की भाषाओं के भी शब्द तलाशे जा सकते हैं। प्रख्यात व्याकरणाचार्य किशोरीदास वाजपेयी कहते थे, कि हिंदी को तो अंतर-प्रांतीय व्यावहार का माध्यम स्वीकार करना है। अँगरेज़ी भाषा के लदे रहने से प्रांतीय भाषाएँ नहीं दबीं, तब हिंदी से क्या दबेंगी ? हिंदी के सहयोग से तो वे अत्यधिक विकसित होंगी। महावीरप्रसाद द्विवेदी जी कहते हैं, कि हिंदी भाषा जीवित भाषा है। जो लोग उसे किसी परिमित सीमा के बीतर ही आवद्व करना चाहते हैं, वे मानो उसका उपचय-उसकी कलेवर-वृद्धि-नहीं चाहते।…संसार में शायद ही ऐसी एक भी भाषा न होगी जिस पर, संपर्क के कारण, अन्य भाषाओं का प्रभाव न पड़ा हो और अन्य भाषाओं के शब्द उसमें सम्मिलित न हो गए हों । अंगरेज़ी भाषा संसार की समृद्ध भाषाओं में है। उसी को देखिए -उसमें लैटिन, ग्रीक, फ्रेंच, जर्मन आदि अनेक भाषाओं के शब्दों, भावों और मुहावरों का सम्मिश्रण है। उसमें संस्कृत भाषा तक के कुछ थोड़े ही परिवर्तित रूप में पाए जाते हैं। उदाहरणार्थ पाथ के रूप में हमारा पथ और ग्रास के रूप में घास प्रायः ज्यों का त्यों विद्यमान है। ये सब उदाहरण इस बात के प्रमाण हैं कि हमारे पुरखे भी प्रगातिशील सोच वाले थे, और वे भाषाई आदान-प्रदान का प्रबल पक्षधर थे।

हिंदी की शब्दावली को समृद्ध करने के लिए दूसरी भाषाओं की नदी में उतरना ही होगा। वैसे हमारी लोक भाषाएँ भी बेहद प्राणवान हैं। छत्तीसगढ़ी भाषा में ही एक-एक शब्द के अनेक पर्यायवाची शब्द मिल जाते हैं। भारतीय भाषाएँ समृद्ध है। इनमें अँगरेज़ी के समतुल्य अनेक शब्द मिल जाएँगे। ऐसा करके हम भाषाई सद्भावना की दिशा में भी एक सशक्त कदम बढ़ाएँगे और तकनीकी शिक्षण के स्वप्न को भी पूरा करेंगे।

अहिंदी भाषी क्षेत्रों में हिंदी

विश्व हिंदी सम्मेलनों में यह प्रस्ताव बार-बार पारित किया गया है कि हिंदी को संयुक्त राष्ट्र की भाषा बनाया जाए। यह भी सच है कि आज हिंदी विश्व के एक सौ से अधिक विश्वविद्यालयों में पढ़ाई जाती है। प्राध्यापकों में भारत से गए प्रवक्ता तो होते ही है, उन्हीं देशों के लोग भी हिंदी में पूरी दक्षता प्राप्त करके वहाँ  अध्यापन कार्य करते है। प्राय:यह भी कहा जाता है कि पहले आप अपने देश में हिंदी को अखिल भारतीय स्तर पर प्रतिष्ठित कर लीजिए, फिर उसे संयुक्त राष्ट्र की भाषा बनाने के विषय में सोचिए। यह एक ऐतिहासिक सच है कि हिंदी और उसका मध्यकालीन स्वरूप ब्रज भाषा कभी हिंदी पट्टी तक सीमित भाषा नहीं रही। अठारहवीं शती में ब्रज भाषा लगभग संपूर्ण देश की काव्य-भाषा बन गई थी। उन्नीसवी-बीसवीं शती में आए नवजागरण के साथ ही प्रादेशिक भाषाओं में लिखने का रुझान बढ़ता जाता है। आम जनता से सीधा संवाद स्थापित करने के लिए यह आवश्यक था। लोकमान्य तिलक और महात्मा गांधी ने अधिकतर लेखन कार्य मराठी और गुजराती में किया।

भाई वीर सिंह के पिता डा. चरण सिंह ब्रज भाषा में कविता लिखते थे, किंतु भाई वीर सिंह ने अपना लेखन पंजाबी में किया। राष्ट्रीयता के प्रसार और संपूर्ण देश में एक संपर्क भाषा की आवश्यकता अनुभव करते हुए विभिन्न प्रदेशों के सुधारकों और राजनेताओं ने हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में स्वीकार किए जाने पर पूरा बल दिया। स्वामी दयानंद गुजराती थे और केशव चंद्र सेन बंगाली थे, किंतु राष्ट्रभाषा के रूप में हिंदी के समर्थक थे। देश के विभिन्न भागों में राष्ट्रभाषा प्रचार समितियों की स्थापना हुई। इनके साथ जुड़ने और हिंदी का प्रचार-प्रसार करने में जिन लोगों ने सक्रिय भूमिका निभाई उनमें से अधिसंख्य की मातृ भाषा हिंदी नहीं थी। जिस प्रकार अठारहवीं शती में ब्रजभाषा में कविता लिखने वालों में उत्तर से दक्षिण भारत तक के कवि थे उसी प्रकार हिंदी में सृजनात्मक लेखन करने की प्रवृत्ति सारे देश में रही है, किंतु अहिंदी प्रदेशों के हिंदी लेखकों में यह भावना सदा विद्यमान रही है कि हिंदी साहित्य का मूल्याँकन करने वाले आलोचक उन्हे हिंदी की मुख्यधारा में शामिल करने के प्रति अनिच्छुक रहते है। अहिंदी भाषी क्षेत्रों के लेखकों को हिंदी में साहित्य-सृजन के लिए प्रोत्साहित करने के लिए 1966 में केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय द्वारा एक पुरस्कार योजना शुरू की गई। उस समय प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने दस लेखकों को पुरस्कार दिया था। इनमें कन्नड़, तेलगू, मलयालम, कोंकणी, मराठी, उड़िया, बंगला और पंजाबी भाषी लेखक सम्मिलित थे। यह योजना आज भी चल रही है।

उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान भी प्रतिवर्ष एक अहिंदी भाषी लेखक को ‘सौहार्द पुरस्कार’ देता है। ऐसे अहिंदी भाषी हिंदी लेखकों की संख्या अगणित है। पुरस्कृत होने वाले लेखकों की संख्या भी पाँचच सौ से अधिक होगी, किंतु इनमें से ऐसे कितने है जो हमारे संज्ञान में हैं या जिनकी रचनाओं को हिंदी की पाठ्य पुस्तकों में सम्मिलित किया जाता है?मुझे कुछ लेखक याद आते है। अनंत गोपाल शेवड़े मराठी भाषी थे, किंतु हिंदी में उन्होंने स्तरीय साहित्य सृजन किया। उनके उपन्यास ज्वालामुखी का भारत की 14 भाषाओं में अनुवाद कराया गया। उनके एक अन्य उपन्यास’मंगला’ को ब्रेल लिपि में भी प्रकाशित किया गया था। अनंत गोपाल शेवड़े का महत्व इस दृष्टि से भी कम नहीं है कि उन्हीं के प्रयासों से 1976 में नागपुर में प्रथम विश्व हिंदी सम्मेलन आयोजित हुआ था। मुझे दूसरा नाम याद आता है रमेश चौधरी अरिगपूडि का। उनकी मातृभाषा तेलगू थी। शिक्षा मंत्रालय द्वारा प्रथम बार जो अहिंदी भाषी हिंदी लेखक पुरस्कृत हुए थे उनमें अरिगपूडि भी थे। हिंदी में उनका विपुल साहित्य प्रकाशित हुआ। उन्होंने अनेक उपन्यास, नाटक और कहानियाँ लिखीं। आंध्र प्रदेश की साहित्य अकादमी और उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान द्वारा वह पुरस्कृत भी हुए थे। चेन्नई में रह रहे बाल शौरि रेड्डी और शौरिराजन आज भी अपने लेखन में सक्रिय है, किंतु ये सभी लेखक हिंदी संसार द्वारा या तो भुला दिए गए है या हाशिए पर चले गए है।

वर्धा में स्थापित महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय इस दिशा में बहुत महत्वपूर्ण कार्य कर सकता था, आज भी कर सकता है। इस समय इस विश्वविद्यालय के कुलपति गोपीनाथन स्वयं मलयालम भाषी है। केरल में हिंदी अध्यापन का उनका लंबा अनुभव है। इस विश्वविद्यालय को सही अर्थो में संपूर्ण हिंदी लेखन का केंद्र बनना चाहिए। देश के किस भाग में किनके द्वारा, किस विधा में, किस प्रकार का सृजन हो रहा है, इसकी विस्तृत जानकारी इस विश्वविद्यालय में उपलब्ध होनी चाहिए। इसी के साथ विश्व के अन्य देशों में कौन से लेखक हिंदी में सृजन-कार्य कर रहे है, उनकी क्या कठिनाइयां है, इसका पूरा संज्ञान इस विश्वविद्यालय को होना चाहिए। दुर्भाग्य यह है कि आज हिंदी में जिसे मुख्यधारा का लेखन माना जाता है वह कुछ क्षेत्रों और कुछ आलोचकों की पूरी जकड़ में आ गया है।

इस समय हिंदी साहित्य की ट्रेन वाराणसी से चलकर गोरखपुर, लखनऊ और इलाहाबाद होती हुई नई दिल्ली पर आकर रुक जाती है। अब न वह पंजाब की ओर जाती है, न बिहार की ओर, न राजस्थान की ओर, न मध्य प्रदेश की ओर, न गुजरात की ओर, न महाराष्ट्र की ओर। आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु और केरल की तो बात ही मत करिए। एक समय कोचीन से मलयालम मनोरमा की ओर से ‘युग प्रभात’ नाम से साप्ताहिक हिंदी पत्र का प्रकाशन प्रारंभ हुआ था। अनेक वर्षो तक उसने हिंदी के अखिल भारतीय स्वरूप को उभारने का प्रयास किया। फिर उसका प्रकाशन बंद हो गया। आज भी हिंदी विद्यापीठ (केरल) से ‘संग्रथन’ मासिक पत्रिका गत बीस वर्ष से प्रकाशित हो रही है। कर्नाटक महिला हिंदी सेवा समिति की ओर से हिंदी प्रचार वाणी (मासिक) अनेक वर्षो से नियमित प्रकाशित हो रही है। इन प्रदेशों में सभी विपरीत परिस्थितियों के बावजूद हिंदी के प्रचार में लगे लोगों का अभाव नहीं है, किंतु इन सभी प्रदेशों में हिंदी में सृजनात्मक लेखन का निरंतर ह्रास हो रहा है।

मुझे लगता है कि अहिंदी भाषी प्रदेशों में हिंदी में किया गया मौलिक लेखन आने वाले कुछ वर्षो में थम जाएगा। वहाँ  के लेखक अपनी-अपनी भाषाओं की ओर झुकते चले जाएँगे, क्योंकि वहाँ  उन्हे अपनी पहचान और स्वीकृति प्राप्त करने में उन व्याधियों में से नहीं गुज़र पड़ेगा जो हिंदी में लिखकर मिलती है। हिंदी का प्रकाशन व्यवसाय भी बुरी तरह सिमटता जा रहा है। इस समय पूरा प्रकाशन-व्यवसाय दिल्ली में केंद्रित हो गया है। एक समय वाराणसी,इलाहाबाद, लखनऊ, कानपुर, पटना, भोपाल और नागपुर जैसे नगरों में बहुत अच्छे प्रकाशन-गृह थे। आज इन नगरों में अच्छे प्रकाशकों की संख्या गिनी-चुनी रह गई है। अहिंदी भाषी प्रदेशों में यह संकट और गहरा है। पता नहीं पुस्तक विक्रेताओं की स्थिति इतनी विषम क्यों हो गई है? विक्रेताओं की शिकायत यह है कि हिंदी में खरीद कर पुस्तक पढ़ने वाला पाठक नहीं है। दूसरी बात यह है कि पुस्तकें इतनी महँगी हो गई है कि पाठक की क्रयशक्ति जवाब दे जाती है। तर्क-वितर्क में कितने ही कारण दिए जा सकते है, किंतु इतना तय है कि हिंदी का संसार निरंतर सिकुड़ता जा रहा है। इसका विस्तार कैसे होगा, इस पर गंभीर विचार किया जाना चाहिए। (आयुष्मान से)

दक्षिण भारत मे हिंदी का प्रचलन

दक्षिण भारत की संज्ञा भारत के दक्षिणी भू-भाग को दी जाती है जिसमें केरल, कर्नाटक, आंध्र एवं तमिलनाडु राज्य तथा संघ शासित प्रदेश पुदुच्चेरी शामिल हैं। केरल में मलयालम, कर्नाटक में कन्नड, आंध्र में तेलुगु और तमिलनाडु तथा पुदुच्चेरी में तमिल अधिक प्रचलित भाषाएँ हैं। ये चारों द्रविड परिवार की भाषाएँ मानी जाती हैं। इन चारों भाषा-भाषियों की संख्या भारत की आबादी में लगभग 25 प्रतिशत है। दक्षिण की इन चारों भाषाओं का अपनी-अपनी विशिष्ट लिपियाँ हैं। सुसमृद्ध शब्द-भंडार, व्याकरण तथा समृद्ध साहित्यिक परंपरा भी है। अपने-अपने प्रदेश विशेष की भाषा के प्रति लगाव के बावजूद अन्य प्रदेशों के भाषाओं के प्रति यहाँ की जनता में निस्संदेह आत्मीयता की भावना है। अतः यह बात स्वतः स्पष्ट है कि दक्षिण भारत भाषाई सद्भावना के लिए उर्वर भूमि है।

धार्मिक, व्यापारिक और राजनीतिक कारणों से उत्तर भारत के लोगों का दक्षिण में आने-जाने की परंपरा शुरू होने के साथ ही दक्षिण में हिंदी का प्रवेश हुआ। यहाँ के धार्मिक, व्यापारिक केंद्रों में हिंदीतर भाषियों के साथ व्यवहार के माध्यम के रूप में, एक बोली के रूप में हिंदी का धीरे-धीरे प्रचलन हुआ।  दक्षिणी भू-भाग पर मुसलमान शासकों के आगमन और इस प्रदेश पर उनके शासन के दौर में एक भाषा विशेष के रूप में दक्खिनी का प्रचलन चौदहवीं से अठारहवीं सदी के बीच हुआ, जिसे ‘दक्खिनी हिंदी’ की संज्ञा भी दी जाती है। बहमनी, कुतुबशाही, आदिलशाही आदि शाही वंशों के शासकों के दौर में बीजापुर, गोलकोंडा, गुलबर्गा, बीदर आदि प्रदेशों में दक्खिनी हिंदी का चतुर्दिक विकास हुआ। दक्खिनी हिंदी का विकास एक जन भाषा के रूप में हुआ था। इसमें उत्तर-दक्षिण की कई बोलियों के शब्द जुड़ जाने से यह आम आदमी की भाषा के रूप में प्रचलित हुई। हैदरअली और टीपू के शासन काल में कर्नाटक के मैसूर रियासत में, अर्काट नवाबों की शासनावधि में तमिलनाडु के तंजावूर प्रांत में, आंध्र के कुछ सीमावर्ती प्रांतों में मराठे शासकों के द्वारा भी यह काफी प्रचलित हुई। आगे चलकर दक्खिनी हिंदी में प्रचुर मात्रा में साहित्य का सृजन भी हुआ है। यहाँ यह बात महत्वपूर्ण है कि हिंदी, हिंदुस्तानी, हिंदवी, उर्दू, दक्खिनी, दक्खिनी हिंदी आदि को एक ही मूल भाषा के विभिन्न शैलियों, बोलियों के रूप में मानकर चलने पर ही यह कथन आधारित है कि दक्षिण भारत में इस भाषा का प्रसार शताब्दियों पूर्व ही हुआ था।

शताब्दियों पूर्व ही दक्षिण में हिंदी भाषा के प्रचलन के संबंध में एक और तथ्यात्मक उदाहरण केरल प्रांत से मिलता है। ‘स्वाति तिरुनाल’ के नाम से सुविख्यात तिरुवितांकूर राजवंश के राजा राम वर्मा (1813-1846) न केवल हिंदी के निष्णात् साबित हुए थे बल्कि स्वयं उन्होंने हिंदी में कई रचे थे। मिसाल के तौर पर उनका एक गीत यहाँ प्रस्तुत है –

मैं तो नहीं जाऊँ जननी जमुना के तीर।

इतनी सुनके मात यशोदा पूछति मुरहर से,

क्यों नहिं जावत धेन चरावन बालक कह हमसे।

कहत हरि कब ग्वालिन मिल हम

मींचत धन कुच से,

जब सब लाज भरी ब्रजवासिन कहे,

न कहो दृग से।

ऐसी लीला कोटि कियो कैसे जायो मधुवन से,

पद्मनाभ प्रभु दीन उधारण पालो सब दुःख से।

माता यशोदा के समक्ष बाल-कृष्ण की शिकायत पर आधारित स्वाति तिरुनाल का यह गीत सैकडों वर्षों पूर्व दक्षिण में हिंदी की सर्जना का भी एक श्रेष्ठ उदाहरण है।

दक्षिण में हिंदी के प्रचलन के कारणों अथवा आधारों का पता लगाने पर यह बात स्पष्ट है कि धार्मिक, राजनीतिक,सामाजिक, सांस्कृतिक, व्यापारिक आदि आनेक आधार हमें मिलते हैं।  इससे यह स्पष्ट होता है कि हिंदी भाषा को दक्षिण पहुँचने का एक व्यापक आधार प्राप्त हुआ था। हाँ, यह मान्य तथ्य है कि यहाँ पहुँचकर हिंदी भाषा को कई शैलियाँ, कई शब्द और रूप मिल गए हैं। आदान-प्रदान का एक बड़ा काम हुआ, यही आगे एकता के आधार बिंदु की खोज का मूल साबित हुआ है। फलतः भिन्न भाषा-भाषियों के बीच आदान-प्रदान का एक सशक्त एवं स्वीकृत भाषा के रूप में दक्षिण में हिंदी प्रचलित हुई है।

आधुनिक काल अर्थात 19 वीं, 20 वीं सदियों के दौरान हिंदी का दक्षिण भारत में व्यापक प्रचलन हुआ। एकता की भाषा के रूप में हिंदी के महत्व को समझकर कई विभूतियों ने इसे अपनी अभिव्यक्ति की वाणी के रूप में अपनाकर देश की जनता से अपील की थी। आर्य समाज के संस्थापक महर्षि दयानंद सरस्वती ने हिंदी का प्रबल समर्थन किया था। उन्होंने हिंदी को ‘आर्य भाषा’ की संज्ञा देकर अपना महत्वपूर्ण ग्रंथ ‘सत्यार्थ प्रकाश’ की रचना हिंदी में ही की थी। स्वामीजी द्वारा संस्थापित आर्य समाज ने जहाँ एक ओर समूचे भारत में भारतीयता एवं राष्ट्रीयता का प्रबल प्रचार किया, वहीं दूसरी ओर हिंदी का प्रचार-प्रसार भी किया। आंध्र में निजाम शासन के दौरान आर्य समाजियों ने चार हिंदी पत्र-पत्रिकाएँ भी प्रकाशित की थीं। उस समय निजाम शासन द्वारा आर्य समाज की गतिविधियों पर रोक लगाए जाने पर राज्य के सीमा पार सोलापुर से इन पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन करके बड़ी चुनौती के साथ राज्य में इनका प्रसार किया जाता था। हिंदी के प्रचलन में आर्य समाज के योगदान का यह एक मिसाल है।

स्वाधीनता आंदोलन के दिनों में भावात्मक एकता स्थापित करने में हिंदी को सशक्त माध्यम मानकर इसके प्रचार के लिए कई प्रयास किए गए। तमिल के सुख्यात राष्ट्रकवि सुब्रह्मण्य भारती ने अपने संपादन में प्रकाशित तमिल पत्रिका ‘इंडिया’ के माध्यम से 1906 में ही जनता से हिंदी सीखने की अपील की थी एवं अपनी पत्रिका में हिंदी में सामग्री प्रकाशित करने हेतु कुछ पृष्ठ सुरक्षित रखने की घोषणा की थी। आगे भारती के ही नेतृत्व में 1907-1908 के बीच मद्रास के ट्रिप्लिकेन में जनसंघ के तत्वावधान में हिंदी कक्षाओं का संचालन आरंभ हुआ था, जिसकी सूचना भारती ने लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक को प्रेषित अपने पत्र (दि.29 मई, 1908) में दी थी। राष्ट्रपिता महात्मा गांधीजी ने अपने रचनात्मक कार्यक्रमों में हिंदी प्रचार को भी जोड़ लिया था। दक्षिण अफ्रीका में प्रवासी भारतीयों के बीच कार्य करते हुए गांधीजी ने यह महसूस किया था कि भिन्न-भिन्न भाषाएँ बोलनेवाले भारतीयों के बीच व्यवहार की भाषा के रूप में हिंदी सर्वोपयुक्त भाषा है। दक्षिण अफ्रीका में बसे हुए प्रवासी भारतीयों में एकता स्थापित करने कि लिए हिंदी को एक सफल माध्यम के रूप में पाकर उन्होंने अपने अनुभव अपनी पत्रिका ‘हिंद स्वराज’ में 1909 में व्यक्त करते हुए लिखा था कि भारतवासियों को एकता की कड़ी में जोड़ने के लिए हिंदी उपयोगी भाषा है। दक्षिण अफ्रीका से लौटने के बाद आज़ादी की लड़ाई में सक्रिय भूमिका निभाते हुए उन्होंने न केवल हिंदी भाषा का पक्ष समर्थन किया, बल्कि इसे राष्ट्रवाणी होने की अधिकारिणी बनाने हेतु इसके व्यापक प्रचार-प्रसार हेतु कारगर क़दम भी उठाए थे। हिंदी गंगोत्री की धारा को दक्षिण के गाँवों तक ले आने संबंधी गांधीजी के भागीरथ प्रयासों से संबंधित ऐतिहासिक तथ्यों से कोई भी अनभिज्ञ नहीं हैं। 29 मार्च, 1918 को इंदौर में संपन्न हिंदी साहित्य सम्मेलन के अधिवेशन में सभापति के मंच से भाषण देते हुए गांधीजी ने कहा था कि जब तक हम हिंदी भाषा को राष्ट्रीय और अपनी-अपनी प्रांतीय भाषाओं को उनका योग्य स्थान नहीं देते, तब तक स्वाराज्य की सब बातें निरर्थक हैं। गांधीजी की राय में भाषा वही श्रेष्ठ है, जिसको जनसमूह सहज में समझ ले। आगे चलकर गांधीजी की संकल्पना से दक्षिण भारत में हिंदी प्रचार का एक बड़ा अभियान शुरू हुआ। आज़ादी हासिल होने के बाद जब स्वतंत्र भारत के संविधान का निर्माण हो रहा था, तब भी गांधीजी के इन महत्वपूर्ण विचारों के अनुरूप ही भारत के संविधान में राष्ट्रीय राजकाज की भाषाओं के रूप में हिंदी को तथा देश के विभिन्न राज्यों में वहाँ की क्षेत्रीय भाषाओं को राजकाज की भाषाओं के रूप में मान्यता देने की चेष्टा की गई है।  गांधीजी के प्रयासों से 16 जून, 1918 को मद्रास में हिंदी वर्गों के आयोजन के साथ ही दक्षिण भारत में हिंदी प्रचार के प्रयासों को ‘हिंदी प्रचार आंदोलन’ के रूप में एक व्यवस्थित आधार मिला। अपनी संकल्पनाओं को साकार बनाने की दिशा में गांधीजी ने अपने सुपुत्र देवदास गांधी को मद्रास भेजा था। गांधीजी से प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष प्रेरणा पाकर बिहार, उत्तर प्रदेश आदि प्रांतों के कई युवक दक्षिण पहुँचकर हिंदी प्रचार-प्रसार कार्य में अपना योगदान सुनिश्चित करने लगे थे। उनसे हिंदी सीखनेवाले हजारों हिंदी प्रेमी हिंदी प्रचारकों के रूप में निष्ठा एवं लगन के साथ दक्षिण के गावों में हिंदी का प्रचार करने लगे थे।

1918 में हिंदी साहित्य सम्मेलन का क्षेत्रीय कार्यालय जो मद्रास में खुला था, वही आगे परिवर्धित होकर दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के रूप में ख्यात हुई। स्वाधीनता प्राप्ति के बाद जब गांधीजी द्वारा संस्थापित संस्थाओं को राष्ट्रीय महत्व की संस्थाओं के रूप में घोषित करने की परंपरा शुरू हुई, उसी क्रम में 1964 में दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा भी राष्ट्रीय महत्व की संस्था घोषित हुई। फिलहाल इस सभा के दक्षिण के चारों राज्यों में शाखाओं के अलावा उच्च शिक्षा शोध-संस्थान भी हैं। सभा द्वारा हिंदी प्रचार कार्यक्रम के अंतर्गत विभिन्न हिंदी परीक्षाओं का संचालन किया जाता है। उच्च शिक्षा एवं शोध संस्थान के माध्यम से उच्च शिक्षा एवं शोध की औपचारिक उपाधियाँ भी प्रदान की जा रही हैं। दक्षिण में हिंदी प्रचार के क्रम में ऐसी कई छोटी-बड़ी संस्थाएँ स्थापित हुई हैं। ऐसे कुछ बड़ी संस्थाओं हिंदी प्रचार कार्य में संलग्न संस्थाएँ शामिल हैं। केरल में 1934 में केरल हिंदी प्रचार सभा, आंध्र में 1935 में हिंदी प्रचार सभा, हैदराबाद और कर्नाटक में 1939 में कर्नाटक हिंदी प्रचार समिति, 1943 में मैसूर हिंदी प्रचार परिषद तथा 1953में कर्नाटक महिला हिंदी सेवा समिति की स्थापना हुई। ये संस्थाएँ हिंदी प्रचार कार्य में अपने ढंग से सक्रिय हैं। इन संस्थाओं के द्वारा संचालित कक्षाओं में हिंदी सीखकर इन्हीं संस्थाओं द्वारा संचालित परीक्षाएँ देनेवाले छात्रों की संख्या आजकल लाखों में है। तमिलनाडु को छोड़कर बाकी तीनों राज्यों के स्कूलों में एक भाषा के रूप में हिंदी की पढ़ाई जारी है। तमिलनाडु में तथाकथित राजनीतिक विरोध के कारण भले ही सरकारी स्कूलों में हिंदी की पढ़ाई नहीं हो रही हो, कई निजी स्कूलों में हिंदी की पढ़ाई जारी है, साथ ही यहाँ भी हिंदी प्रचार संस्थाओं की परीक्षाओं में बैठनेवाले छात्रों की संख्या भी लाखों में है। यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि तमिलनाडु में ‘हिंदी स्पीकिंग कोर्स’के बोर्ड हर कोई छोटे-बड़े शहर की छोटी-बड़ी गलियों में नज़र आते हैं।

इसी क्रम में दक्षिण में हिंदी के प्रचार-प्रसार में योग देने में कई निजी प्रयास भी सामने आए हैं। निःशुल्क हिंदी कक्षाओं का संचालन, लेखन, प्रकाशन, पत्रकारिता, गोष्ठियों का आयोजन आदि कई रूपों में हिंदी के प्रचार-प्रसार हेतु कई प्रयास किए जा रहे हैं। यहाँ हिंदी फिल्मों के प्रदर्शन की बड़ी मांग रहती है, इनके दर्शकों में अधिकांश हिंदीतर भाषी भी होते हैं। हिंदी गीतों की लोकप्रियता की बात तो अलग ही है। अंत्याक्षरी, गायन आदि कई रूपों में हिंदी गीत दक्षिण के सांस्कृतिक जीवन के अभिन्न अंग बन गए हैं। हिंदीतर भाषियों का हिंदी भाषा का अर्जित ज्ञान इतना परिमार्जित हुआ है कि यहाँ सैकडों की संख्या में हिंदी के लेखक उभर कर सामने आए हैं। परिनिष्ठित हिंदी में इनकी लेखनी से सृजित हजारों कृतियाँ हिंदी साहित्य की धरोहर बन गई हैं। दक्षिण से सैकडों की संख्या में हिंदी की पत्र-पत्रिकाएँ प्रकाशित हुई हैं। इनमें हिंदीतर भाषियों द्वारा हिंदी प्रचार हेतु निजी प्रयासों से संचालित पत्रिकाएँ भी कई हैं। हैदराबाद, बैंगलूर तथा चेन्नई नगरों से तीन बड़े हिंदी अखबार प्रकाशित हो रहे हैं। कई छोटे अखबार भी इन नगरों के अलावा अन्य शहरों से भी प्रकाशित हो रहे हैं। लेखन द्वारा हिंदी जगत में ख्यात होने वाले दक्षिण के हस्ताक्षरों में उपन्यासकार आरिगपूडि रमेश चौधरी, डॉ. बालशौरि रेड्डी के नाम उल्लेखनीय हैं। इनके अलावा कई लब्धप्रतिष्ठ लेखक भी हैं, इस लेख का आकार तथा सीमाओं को ध्यान में रखते हुए उन सबके नामों तथा योगदान का उल्लेख यहाँ करना संभव नहीं हो रहा है।

निष्कर्ष के तौर पर कहा जा सकता है कि दक्षिण में हिंदी भाषा के प्रचार-प्रसार के साथ अध्ययन, अध्यापन, लेखन,प्रकाशन में उल्लेखनीय प्रगति हुई है। दक्षिण में हिंदीतर भाषी विभिन्न भाषा-भाषियों के बीच भी एक आम संपर्क भाषा के रूप में हिंदी की भूमिका अविस्मरणीय है। भारत संघ की राजभाषा के रूप में इसका प्रचार-प्रसार एवं प्रयोग अन्य गैर-हिंदी प्रांतों की तुलना में दक्षिण में अधिक है। जनता की ज़रूरतों तथा सरकार की नीतियों के आलोक में दक्षिण भारत में हिंदी भाषा का भविष्य निश्चय ही उज्जवल रहेगा।

बाजार की मार से बेज़ार हैं किताबें

बाजार की मार और प्रहार इतने गहरे हैं कि किताबें दम तोड़ने को मजबूर है। इलेक्ट्रानिक मीडिया का गहराता नशा,उपभोक्तावादी ताकतों के खेल तथा पाठकों के संकट से जूझतीं ‘किताबें’ जिएं तो जिए कैसे? इस दमघोंटू माहौल में क्या किताबें सिर्फ पुस्तकालयों की शोभा बनकर रह जाएगी या मीडिया के नए प्रयोग उसकी उपयोगिता ही समाप्त कर देंगे, यह सवाल अब गहरा रहा है।   अरसा पहले ईश्वर की मौत की घोषणा के बाद उपजे विमर्शों में नई दुनिया के विद्वानों ने इतिहास, विचारधारा, राजनीति, संगीत, किताबें, रंगमंच एक-एक कर सबकी मौत की घोषणा कर दी। यह सिलसिला रुकता इसके पूर्व ही सुधीश पचौरी ने ‘कविता की मौत’ की घोषणा कर दी। यह सिलसिला कहां रुकेगा कहा नहीं जा सकता। और अब बात किताबों के मौत की। हमने देखा कि मृत्यु की घोषणाओं के बावजूद ये सारी चीजें अपनी-अपनी जगह ज्यादा मजबूती से स्थापित हुईं और आदमी की जिंदगी में ज्यादा बेहतर तरीके से अपनी जगह बना ले गयीं।

किताबों की मौत का सवाल इस सबसे थोड़ा अलग है, क्योंकि उसके सामने चुनौतियां आज किसी भी समय से ज्यादा हैं। शोर है कि किताबों के दिन लद गए। किताबों के ये आखिरी दिन हैं। किताब तो बीते जमाने की चीज है। शोर में थोड़ा सच भी है, उनकी पाठकीयता प्रभावित जरूर हुई, स्वीकार्यता भी घटी। इसके बावजूद वह मरने को तैयार नहीं है। जिन देशों में आज इलेक्ट्रानिक माध्यमों के 300 से ज्यादा चैनल है, 10 में से 6 लोगों के पास इंटरनेट कनेक्शन हैं, वहां भी किताबें किसी न किसी रूप में क्यों आ रही है? वे कौन से सामाजिक, आर्थिक दबाव हैं, जो किताब और पाठक की रिश्तेदारी के अर्थ और आयाम बदलने पर आमादा हैं। खासकर हिंदी भाषी क्षेत्रों में किताबों की जैसी दुर्गति है, उसके कारण क्या हैं? इलेक्ट्रानिक मीडिया एवं सूचना आधारित वेबसाइटों के भयावह प्रसार वाले देशों में किताबें अगर उसकी चुनौती को स्वीकार कर अपनी जमीन मजबूत बना पाई हैं जो भारतीय संदर्भ में यह चित्र इतना विकृत क्यों हैं? निश्चय ही हिंदी क्षेत्र के लिए यह चुनौती सहज नहीं खासी विकट है। इसे हल्के ढंग से नहीं लिया जा सकता। किताब लिखने और छापने वालों सबके लिए यह समय महत्व का है, जब उन्हें ऐसी सामग्री पाठकों को देनी होगी, जो उन्हें अन्य मीडिया नहीं दे पाएगा। इलेक्ट्रानिक मीडिया ने वैसे भी जैसी छिछली, सस्ती और सतही सूचनाओं का जखीरा अपने दर्शकों पर उड़ला है, उसमें ‘किताब’ के बचे रहने की उम्मीदें ज्यादा है। इलेक्ट्रानिक मीडिया में गंभीरता के अभाव के चलते किताबों को गंभीरता पर ध्यान देना होगा वरना हल्केपन का परिणाम वही होगा कि इलेक्ट्रानिक मीडिया पर हिंदी फिल्मों पर आधारित कार्यक्रमों की लोकप्रियाता तो बढ़ी, किंतु हिंदी की कई फिल्म पत्रिकाएं लड़खड़ा कर बंद हो गई। इसके बावजूद किताबों के प्रकाशन के क्षेत्र में बाहर से हालात इतने बुरे नजर नहीं आते। हिंदी में किताबें खूब छप रही हैं। प्रकाशकों की भी संख्या बढ़ी है। फिर पाठकीयता के संकट तथा किताबों की मौत की चर्चाएं आखिर क्यों चलाई जा रही हैं? सवाल का उत्तर तलाशें तो पता चलेगा कि हमारे प्रकाशकों को हिंदी साहित्य से खासा प्रेम है। इसके चलते ज्ञान-विज्ञान के विविध अनुशासनों पर पुस्तकों का खासा अभाव है। सिर्फ साहित्य की पुस्तकों के प्रकाशन के चलते हिंदी में मनोरंजन, पर्यटन, चिकित्सा, इंजीनियरिंग, कला,संस्कृति जैसे विषयों पर किताबों बहुत कम मिल पाती हैं। हां। अध्यात्म की किताबों का प्रकाशन जरूर बड़ी मात्रा में होता है, हालांकि उसके बिक्री एवं प्रकाशन का गणित सर्वथा अलग है। हिंदी प्रकाशकों के साहित्य प्रेम के विपरीत अंग्रेजी किताबों के प्रकाशन बमुश्किल 10 प्रतिशत किताबें ही ‘साहित्य’ पर छापते हैं। इसके चलते विविध रुचियों से जुड़े पाठक अंग्रेजी पुस्तकों की शरण में जाते हैं। बाजार की इसी समझ ने ज्ञान-विज्ञान के विविध अनुशासनों पर अंग्रेजी का रुतबा कायम रखा है।

राज्याश्रय में पलता प्रकाशन उद्योग

हिंदी प्रकाशन उद्योग की सबसे बड़ी समस्या उसका जनता से कटा होना है। सूचनाओं के महासमुद्र में गोते लगाने एवं अच्छी कृतियों को समाने लाने से वे बचना चाहते हैं। सरकारी खरीद एवं पाठयक्रमों के लिए किताबें छापना प्रकाशकों का प्रमुख ध्येय बन गया है। सरकारी खरीद होने में होने वाली कमीशनबाजी के चलते किताबों के दाम महंगे रखे जाते हैं। 50 रुपए की लागत की कोई भी किताब छापकर प्रकाशक उसे 75 रुपए में बेचकर भी लाभ कम सकता है, पर यहां कोई गुना खाने की होड़ में, कमीशन की प्रतिस्पर्धा में 50 रुपए की किताब की कीमत 200 रुपए तक पहुंच जाती है। फिर साहित्य के इतर विषयों पर हिंदी पाठकों को किताबें कौन पहुंचेगा? अनुवाद के माध्यम से बेहतर किताबें लोगों तक पहुंच सकती हैं, लेकिन इस ओर जोर कम है, प्रायः प्रकाशक किसी किताब के एक संस्करण की हजार प्रतियां छापकर औन-पौने बेचकर लाभ कमाकर बैठ जाते हैं। उन्हें न तो लेखकर को रायल्टी देने की चिंता है, न ही किताब के व्यापक प्रसार की। सरकारी खरीद और पुस्तकालयों में पांच सौ हजार प्रतियां ही उन्हें लागत एवं मुनाफा दोनों दे जाती हैं। इससे ज्यादा कमाने की न तो हमारे प्रकाशकों की इच्छा है, न ललक। प्रकाशकों का यह ‘संतोषवाद’ लेखक एवं पाठक दोनों के लिए खतरनाक है। प्रकाशक प्रायः यह तर्क देते हैं कि हिंदी में पाठक कहां है?वास्तव में यहा तर्क भोथरा एवं आधारहीन है। मराठी में लिखे गए उपन्यास ‘मृत्युंजय’ (शिवाजी सावंत) के अनुवाद की बिक्री ने रिकार्ड तोड़े। प्रेमचंद, बंगला के शरदचंद्र, देवकीनंदन खत्री, हाल में सुरेन्द्र वर्मा की ‘मुझे चांद चाहिए’ ने बिक्री के रिकार्ड बनाए। विभिन्न प्रकाशकों द्वारा प्रारंभ किए गए पेपरबैक सस्करणों को मिली लोकप्रियता यह बताती है कि हंदी क्षेत्र में लोग पढ़ना चाहते हैं, पर कमीशनबाजी और राज्याश्रय के रोग ने पूरे प्रकाशन उद्योग को जड़ बना दिया है। पाठकों तक विविध विषयों की पुस्तकें पहुंचाने की चुनौती से भागता प्रकाशन उद्योग न तो नए बाजार तलाशना चाहता है, न ही बदलती दुनिया के मद्देनजर उसकी कोई तैयारी दिखती है। प्रायः लेखकों की रायल्टी खाकर डकार भीन लेने वाला प्रकाशन उद्योग यदि इतने बड़े हिंदी क्षेत्र में पाठकों का ‘टोटा’ बताता है तो यह आश्चर्यनजक ही है।

 

पाठक और किताब का रिश्ता

पाठक और किताब का रिश्तों पर नजर डाले तो वह काफी कुछ बदल चुका है। प्रिंट मीडिया पर इलेक्ट्रानिक माध्यमों से लेकर तमाम सूचना आधारित वेबसाइटों के हमले और सामाजिक-आर्थिक दबावों ने किताबों और आदमी के रिश्ते बहुत बदल दिए हैं। किताबों ने तय तक कर लिया है कि व महानगरों में ही रहेंगी, जबकि हिंदुस्तान की एक बड़ी आबादी गांवों में रहती है। किताब पढ़ने का उनका संस्कार नहीं है, यह मान लेना भी गलत होगा बरना रामचरित मानस, पंचतंत्र, चंद्रकांता संतति जैसा साहित्य गांवों तक न पहुंचता। शायद किताबों का इस संकट में कोई कुसूर नहीं है। दुनिया के महानगरीय विकास ने हमारी सोच, समझ और चिंतन को भी ‘महानगरीय’ बना दिया है। वैश्वीकरण की हवा ने हमें ‘विश्व नागरिक’ बना दिया। ऐसे में बेचारी किताबें क्या करें? बड़े शहरों तक उनकी पहुच है। परिणाम यह है कि वे (किताबें) विश्वविद्यालयों महाविद्यालयों के पुस्तकालयों की शोभ बढ़ा रही हैं। ज्यादा सुविधाएं मिलीं तो सरकारी या औद्योगिक प्रतिष्ठानों के राजभाषा विभागों, पुस्तकालयों में वे सजी पड़ी हैं। पुस्तक मेंलों जैसे आयोजन भी राजधानियों के नीचे उतरने को तैयार नहीं है। जाहिर है आम आदमी इन किताबों तक लपककर भी नहीं पहुच सकता।

विश्व-फ़लक पर हिन्दी: कुछ सुझाव

हिन्दी की साहित्यिक गरिमा और लिपि की वैज्ञानिकता से सभी विद्वजन परिचित हैं। अनेक बाधाओं, व्यवधानों और उतार-चढ़ाव के बावज़ूद भी आज हिन्दी विश्व-मंच पर अपना स्थान बनाने जा रही है, यह हमारे देश के लिए बहुत ही गर्व की बात है। हिन्दी भाषा आज के युग की भाषा बने, विज्ञान और नई तकनीक की भाषा बने, यह आज के युग की माँग है और हमें चाहिए कि हम इस ओर कुछ ठोस कदम उठाएं।

भारत वैदिक काल से ही साहित्यिक, सांस्‍कृति‍क और वैज्ञानिक दृष्‍टि‍ से अति समृद्ध रहा है, लेकिन उसके इस समृद्ध-कोश को विदेशियों द्वारा कभी चुराया गया तो कभी नष्ट किया गया है। आज आवश्यकता है कि हम अपने पुराने ज़ख्मों को भूलें. उन पर मरहम रखते हुए फ़िर से दुनिया के साथ आगे बढ़ें और भारत की उस गरिमा को प्राप्त करे जो वैदिक युग में थी।

आज संस्कृत की अपेक्षा हिन्दी बहुगम्य भाषा होती जा रही है और विश्व में अपना स्थान बना रही है तो क्यों नहीं हम उसके माध्यम से  विभिन्न विषयों सम्बन्धी ज्ञान को सरल भाषा में विकसित करें। हिन्दी मंच पर न केवल साहित्यिक विद्वानों को वरन् वैज्ञानिक, सामाजिक और शैक्षिणिक विद्वानों को भी स्थान मिलना चाहिए, जिससे हम यह जान सकें कि इन विषयों में हिन्दी-प्रयोग की क्या-क्या कठिनाइयाँ आ रही हैं, जिनके कारण हिन्दी वह स्थान नहीं ले पा रही है जो अंग्रेज़ी भाषा को प्राप्त है।

वैसे कई समस्याओं का हल काफ़ी हद तक हो रहा है, परंतु उनकी गति बहुत ही धीमी है। जो भारतीय विदेशों में कार्यरत हैं और जिनका हिन्दी- भाषा पर पूरा अधिकार है, वे ऐसे तकनीकी मार्ग खोज सकते हैं। स्पष्टत: कहूँ तो हमारी सबसे बड़ी कमज़ोरी यह रही है कि हिन्दी- भाषा को साहित्य से ही अधिक जोड़ कर देखा जाता है, विभिन्न भाषाओं से अनुवाद भी अधिकांशत: साहित्य का ही होता हैं, जबकि आज के युग की प्रबल माँग है कि विज्ञान और तकनीकी विषयों का अनुवाद हिन्दी में सरल, मानक और बोधगम्य रूप में हो। क्लिष्ट शब्द और त्रुटिपूर्ण अनुवाद लोगों को हिन्दी से दूर कर रहे हैं। कितने ही ऐसे विषय हैं जिनका हिन्दी में ठीक से अनुवाद नहीं हो पा रहा है, जो वर्तमान युग के लिए महत्वपूर्ण हैं। यही कारण है कि अंग्रेज़ी हर व्यक्ति की ज़रूरत बनती जा रही है। अत: हमारा प्रयत्न यह होना चाहिए कि नई पीढ़ी सक्षम अनुवादकों/भाषान्तरकारों की होनी चाहिए जिनका अंग्रेज़ी-हिन्दी पर समानाधिकार हो, साथ ही उन्हें विज्ञान और तकनीकी की पूर्ण जानकारी हो।

भाषा के दो मुख्य स्वरूप हैं : १.मौखिक २- लिखित। हिन्दी भाषा का मौखिक स्वरूप तो बहु-लोकप्रिय है और हो रहा है। आँकड़े बता रहे हैं कि आज हिन्दी विश्व में सबसे अधिक बोली और समझी जानेवाली भाषा कही जा सकती है,परंतु इसका दूसरा पहलू जो लेखन और लिपि से सम्बन्धित है, उसमें सरलता और सहजता की अत्यन्त आवश्यकता है, जिससे लिखने में  भी इसका प्रयोग अधिकाधिक हो सके। इसके लिए यद्यपि काफ़ी कार्य हुआ है, मानक रूप भी तैयार हुआ है तथापि अभी तक भी वह इतना सरल नहीं हुआ है कि लोग इसे आसानी से अपना सकें। जन-सामान्य में अभी भी काफ़ी भ्रांतियाँ हैं, मुख्यत: अनुस्वार और चन्द्रबिन्दु को लेकर, साथ ही ‘नुक्ते’ का प्रयोग भी उन्हें भटकाता है, कहाँ लगाए, कहाँ न लगाएं की स्थति तो पैदा करता ही है, लिखने में अथवा टाइप करने में भी व्यवधान उत्पन्न करता है। अत: साहित्य को छोड़ कर इनके प्रयोग में उदारता बरती जाए और सरलीकरण की ओर कदम बढ़ाएं जाएं,तो लोग रोमन-लिपि का सहारा लेना छोड़ सकते हैं।

कंप्यूटर हिन्दी में सहज होना चाहिए। हिन्दी के मनीषी कंप्यूटर की जानकारी बहुत कम रखते हैं, जिसके कारण वे अपनी बात अन्तर्जाल(internet) पर नहीं कह पाते हैं अत: हमें कुछ ऐसे युवा-वर्ग की आवश्यकता है जो इस कार्य का दायित्व  अपने कंधों पर उठाएं। आज हो यह रहा है कि जो वर्ग कंप्यूटर जानता है, उनका हिन्दी ज्ञान कम है और जिनको हिन्दी-ज्ञान है, वे कंप्यूटर नहीं जानते। यही कारण है कि अन्तर्जाल पर हिन्दी के माध्यम से जो सूचनाएं मिलनी चाहिए वे सब अंग्रेज़ी में सहज उपलब्ध हैं इसीलिए अंग्रेज़ी का प्रयोग दिन-ब दिन बढ़ता जा रहा है। इन पर हिन्दी में काम होना चाहिए और पूर्ण प्रचार-प्रसार होना चाहिए जिससे जन-सामान्य भी इसका उपयोग कर सकें। उदाहरण के लिए जैसे – कंप्यूटर में लिखने के लिपि-अक्षर(फ़ॊन्ट्स) अब ‘य़ूनिकोड’ में बहुत सरल हो गए हैं, जिनके कारण ई-मेल में बहुत सुविधा हो गई है, लेकिन यह बात कितने लोगों को ज्ञात है? जो विभिन्न राजकीय दफ़्तरों में हिन्दी भाषा अधिकारी हैं और कंप्यूटर पर हिन्दी में काम करते हैं, वे भी नहीं जानते जबकि इस प्रकार की नवीनतम जानकारी बिजली की भाँति हिन्दी-जगत में फ़ैलनी चाहिए। यह तभी हो सकता है जब कंप्यूटर पर कार्य करने वाला भारतीय इसके लिए कटिबद्ध रहे और इसमें कुशलता का विकास करे।

अगली विशेष बात है ‘शब्दकोश’ की। हिन्दी–शब्दकोश का प्रयोग हिन्दी नहीं जानने वालों के लिए बड़ा उलझन भरा है। हिन्दीतर प्रदेशों के लोगों को बार-बार शब्दकोश देखने की आवश्यकता होती है,अत: शब्दकोश को वर्णमाला क्रम के अनुसार मानक और सहज बनाया जाय तो यह एक वरदान हो जाएगा। उदाहरणार्थ- वर्तमान में हिन्दी-शब्दकोश देखना सीखना होता है, पहले उसकी बारीकियों से छात्रों को अवगत करवाना पड़ता है और अभ्यास करवाना होता है कि कौन-सा वर्ण शब्दकोश में कहाँ आएगा? यदि वर्णमाला में स्वरों का क्रम देखें तो हम पाएंगे कि जो अं का  क्रम वर्णमाला में अंत में आता है, बारह्खड़ी भी इसी क्रम से सिखाई जाती है, परन्तु शब्दकोश में वही पहले आता है, जैसे-अनुस्वार/अनुनासिक वाले शब्द(अंक आदि)। फ़िर शब्दकोश में इस प्रकार का क्रम उलझन पैदा करता है। व्यंजन को बिना स्वर के अर्द्धाक्षर माना गया है, कहने का तात्पर्य यह है कि यदि यह व्यंजन का  मूल रूप है, तो शब्दकोश में पहले अर्द्धाक्षर वाले शब्द आने चाहिए, जैसे—क्या.क्यारी आदि।

इसीप्रकार संयुक्त-व्यंजन जिनका अब स्वतंत्र रूप बन गया है ( क्ष,त्र,ज्ञ,श्र,)  और जिन्हें वर्णमाला क्रम के अंत में दर्शाया जाता है, उन्हें शब्दकोश में भी बाद में ही लिया जाय तो सुविधा होगी। यह ठीक है कि इस प्रकार की परंपरा संस्कृत-काल से चली आ रही है और इसके कई शास्त्रीय कारण भी हो सकते हैं, पर मैं यहाँ एक हिन्दीतर प्रदेश के छात्र के दृष्टिकोण से बात कर रही हूँ जो सम्पर्क-भाषा के रूप में भाषा सीखना चाहता है।

अत: विद्वजनों से मेरा नम्र निवेदन है कि हिन्दी को सरल, सह्ज और बहुगम्य बनाने की राह में जो अवरोध आ रहे हैं उन पर उदारता से विचार कर निष्कर्ष निकालें और हिन्दी भाषा को सुव्यवस्थित रूप में विस्तरित होने का अवसर दें, अन्यथा भाषा तो सरिता की भाँति है जो अपना रास्ता ‘मुन्ना भाई’ की भाँति निकाल ही लेगी, जो शायद हिन्दी प्रेमियों को ग्राह्य नहीं होगा।

हमारा ध्येय होना चाहिए —

‘तुलसी क्यारी सी हिन्दी को,

हर आँगन में रोपना है।

यह वह पौधा है जिसे हमें,

नई पीढ़ी को सौंपना है।’

हिन्दी और विज्ञान लेखन

किसी भी ज्ञान-विज्ञान को लोकप्रिय बनाने में भाषा, लेखन शैली एवं लेखन विधा का योगदान महत्वपूर्ण रहा है। संभवत इसीलिए लेखन की अनेक अन्य विधाओं का विकास हुआ है, जैसे कथा, कहानी, कार्टून, गल्प, कविता,नाटक, लेख, फीचर, समाचार कथा आदि। इस कारण आज विज्ञान साहित्य भी प्रचुर मात्रा में इन विधाओं में प्राप्त हो रहा है। प्रस्तुत है विज्ञान लेखन पर सारगर्भित आलेख – संपादक

आज के युग में विज्ञान के ज्ञान को जन साधारण तक पहुँचाने का कार्य कितना महत्वपूर्ण है, इसे दोहराने की आवश्यकता नहीं है। विज्ञान के सरल ज्ञान को जन-जन तक पहुँचाना विदेशी भाषा के द्वारा  नहीं हो सकता और न ही विकास का मार्ग ही प्रशस्त हो सकता है। इस संदर्भ में भारतेन्दु हरिशचन्द की निम्न पंक्तियाँ सार्थक हैं-

निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल।

बिनु निज भाषा ज्ञान के, मिटै न हिय के शूल।।

ऐसा विज्ञान जो जनमानस के ज्ञानवर्द्धन के लिए रोचक ढंग से लिखा कहा या प्रदर्शित किया जाए जिससे कि सैद्धांतिक पक्षों में उलझे बिना वैज्ञानिक तथ्यों की जानकारी हो सके, लोकप्रिय विज्ञान कहलाता है। विज्ञान, साहित्य से भिन्न होता है तथा इसमें मनचाहे शब्दों का प्रयोग नहीं किया जा सकता है। विज्ञान अपने आप में एक अनुशासित विषय है तथा इसकी अपनी भाषा होती है। इसमें तकनीकी शब्दावली का ही प्रयोग अपेक्षित है जिसमें शब्दार्थ एवं भावार्थ दोनों एक ही होते हैं। अतः जो लोग यह तर्क देते हैं कि शब्दावली आयोग द्वारा निर्धारित की गई पारिभाषिक शब्दावली क्लिष्ट है, सरलीकरण होना चाहिए, उन लोगों को ध्यान रखना चाहिए कि शब्द कभी क्लिष्ट नहीं होते हैं। शब्द हमेशा परिचित एवं अपरिचित ही होते हैं। जितना-जितना उनसे परिचित होने का अभ्यास होता रहेगा, वे सरल लगने लगेंगे।

आज अनुसंधानकर्त्ताओं द्वारा ऐसे तथ्यों और शब्दों का पता लगाया जा रहा है जिन्हें जन सामान्य की भाषा में व्यक्त ही नहीं किया जा सकता है, जैसे क्वांटम सिद्धांत, पार्टिकल फिजिक्स अथवा वनस्पति विज्ञान में पौधों के वर्गीकरण से संबंधित कुलों के नाम, ऐसे शब्दों को हिन्दी के किसी विशेष शब्द द्वारा नहीं समझाया जा सकता है। इनका ज्यों का त्यों प्रयोग करना ही श्रेयस्कर रहता है क्योंकि ये जन मानस में प्रचलित हो चुके हैं, जैसे हारमोन,विटामिन, एक्स-रे, अल्ट्रासाउन्ड, कम्प्यूटर, इंटरनेट, जीनोम आदि।

किसी भी ज्ञान-विज्ञान को लोकप्रिय बनाने में भाषा, लेखन शैली एवं लेखन विधा का योगदान महत्वपूर्ण रहा है। संभवत इसीलिए लेखन की अनेक अन्य विधाओं का विकास हुआ है, जैसे कथा, कहानी, कार्टून, गल्फ, कविता,नाटक, लेख, फीचर, समाचार कथा आदि। इस कारण आज विज्ञान साहित्य भी प्रचुर मात्रा में इन विधाओं में प्राप्त हो रहा है। बच्चों में वैज्ञानिक रूचि एवं जागृति उत्पन्न करने के लिए तो ये विज्ञान कथाएँ बहुत ही प्रभावी माध्यम हैं। अतःएव बाल विज्ञान कथा लेखन विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। हिन्दी विज्ञान लेखन में नाटक विधा का भी समावेश हो चुका है। इसके द्वारा वैज्ञानिक जानकारी देने, अवैज्ञानिक भ्रांतियों का निवारण करने तथा विज्ञान में रूचि उत्पन करने का सफल प्रयास किया जा सकता है। विज्ञान लेखन की एक विधा `चम्पू’ भी है। इस शैली में गद्य तथा पद्य दोनों का उपयोग होता है। मोटेतौर पर इसे लोग `नौटंकी’ विधा भी कहते हैं। आजकल साक्षरता के प्रचार में दूरदर्शन पर अनेक विज्ञापन इसी शैली में आते है। विज्ञान लोकप्रियकरण के सिलसिले में आयोजित नाटकों एवं नुक्कड़ नाटकों में यह विधा उपयोगी होती है। इसमें वार्तालाप के बीच-बीच में, प्रभावी कविताओं तथा शेर-शायरी का उपयोग किया जाता है। विज्ञान लेखन को ललित बनाने में यह शैली अत्यन्त ही उपयोगी है।

संचार माध्यमों में विज्ञान लेखन

विज्ञान लेखन कई विधाओं- कहानी, गल्प, कार्टून, कविता, पहेली चुटकुले, नाटक, कथा आदि में मिलता है।

संचार माध्यम : रेडियो, दूरदर्शन, समाचार पत्र में कुछ विशिष्टता है।

देहाती क्षेत्रों में रेडियो आज भी बहुत लोकप्रिय संचार माध्यम है। आकाशवाणी द्वारा समय-समय पर विज्ञान वार्ताएँ, कृषि एवं विज्ञान समाचार, मौसम संबंधी जानकारी सुलभ कराई जाती हैं। इसमें विशेषज्ञों से आलेख अथवा उन्हें परिचर्चा में आमंत्रित किया जाता है। आकाशवाणी द्वारा ज्वलंत समस्याओं एवं नवीन विषयों-एड्स, लेसर चिकित्सा, पर्यावरण प्रदूषण, जनसंख्या नियंत्रण, गर्भावस्था एवं स्वास्थ्य सुरक्षा, कम्प्यूटर सूचना प्रौद्योगिकी एवं जैव प्रौद्योगिकी पर विज्ञान नाटक, कविताएँ आदि भी आमंत्रित की जाती हैं।

रेडियो पर कार्यक्रम देते समय यह ध्यान में रखना चाहिए कि आपके एवं श्रोता के बीच दीवार न हो। आपकी बात तभी श्रोता के मन में उतरेगी जब वह उसके काम की होगी, उसकी जानकारी बढ़ाती होगी और जिज्ञासा शांत करती होगी। श्रोता आपके सामने नहीं है। उस तक मात्र आपकी आवाज़ ही पहुँच रही है। अतः आपके सम्प्रेषण में यदि जान है तो वह आपकी बात को कभी अनसुना नहीं कर सकता। अतः आप ऐसे कार्यक्रम बोलचाल की भाषा में लिखें व पढ़ें। लिखने की भाषा में तो एक प्रबद्धता होती है परंतु बोलते समय यह जरूरी नहीं कि व्याकरण के नियमों के अनुसार ही वाक्य मुँह से निकलें।

अतः विज्ञान वार्ता में श्रोता वर्ग का ध्यान रखते हुए आप बोलने की भाषा ही लिखिए, न कि लिखने की भाषा। यदि आप स्वयं वार्ता दे रहे हैं तो आप उसे आलेख के रूप में न पढ़ें वरन बोलें, क्योंकि बतकही का एक अलग ही रस होता है, जो आपकी वार्ता में नहीं हुआ तो उसे सुनेगा कौन?

आप विज्ञान वार्ता में श्रोता वर्ग का खास ध्यान रखें। बच्चों के लिए वार्ता है तो भारी शब्द, लंबे वाक्य, संयुक्ताक्षर वाले शब्दों से बचें। आँकड़ों के मायाजाल से बचे। युवाओं के लिए संबोधित कार्यक्रमों में उनकी आकांक्षाओं और सपनों के अनुरूप विज्ञान की नयी-नयी दिशाओं का बोध कराने वाली जानकारी होनी चाहिए।

एक बात का ध्यान रखें कि आपकी वार्ता किसी अंधविश्वास का समर्थन नहीं होनी चाहिए क्योंकि यह वैज्ञानिक चेतना जागृत करने में बाधक होता है। इसके अतिरिक्त आप समाचार पत्रों में, पत्र-पत्रिकाओं में विज्ञान स्तंभ के अन्तर्गत ऐसा क्यों होता है, बूछो तो जाने, विज्ञान पहेली, विज्ञान कविता आदि भी लिख सकते हैं।

अपना वैज्ञानिक ज्ञान परखिए – चार संभावित उत्तर देते हुए विविध विषयों पर 15-20 प्रश्न बनावें।

  • खेल-खेल में विज्ञान-साइंस मॉडल।
  • विचित्र विज्ञान रहस्यों से संकलित समाचार।
  • ऐसा क्यों होता है-मेंहदी का रंग, जुगनू की चमक, कम्प्यूटर की प्रणाली, दांत की सीमेन्ट।
  • विज्ञान हमारे आस-पास प्रयोग दिखावें।
  • विज्ञान कार्टून-चित्रों एवं कार्टून द्वारा विज्ञान विषयक जानकारी।
  • क्या और कैसे – वैक्सीन
  • विज्ञान क्व़िज।

आज के युग में विज्ञान लेखन में लेखकों को निम्न बिन्दुओं पर ज़रूर विचार करना चाहिए-

  • लेखक को विषय वस्तु का पूर्ण ज्ञान होना चाहिए।
  • लेखकों को पाठकों के मानसिक, सामाजिक, सांस्कृतिक तथा बौद्धिक स्तर का भी ज्ञान रखना चाहिए।
  • लेखों की भाषा सरल, सुबोध तथा जन सामान्य की समझ की होनी चाहिए।
  • इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का प्रयोग शब्दावली के प्रचार-प्रसार के लिए करना चाहिए।
  • विज्ञान के ज्वलंत विषयों में लोकोपयोगी साहित्य का सृजन होना चाहिए।
  • वरिष्ठ वैज्ञानिकों को अँग्रेज़ी का मोह त्याग कर हिन्दी में लेखन करने की प्रवृत्ति को बढ़ावा देना चाहिए।

अंत में यह कहना चाहूँगा कि आज हिन्दी में विज्ञान का भविष्य बहुत उज्जवल हो चुका है। वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दावली आयोग, केन्दीय निदेशालय एवं हिन्दी ग्रंथ अकादमियों तथा स्वयं सेवी संस्थाओं प्रमुखत विज्ञान परिषद् प्रयाग ने इस दिशा में महत्वपूर्ण कार्य किया है। आज हिन्दी में विज्ञान विषय पर लगभग 3000 से अधिक लेखक विद्यमान हैं जिनमें 150 महिलाएँ भी सम्मिलित हैं तथा हिन्दी में विभिन्न विज्ञान विषयक लगभग एक सहस्त्र पुस्तकें प्रकाशित भी हुई हैं। आज हमें आत्मविश्वास तथा निष्ठा की ज़रूरत है। जब तक हर विज्ञान प्रेमी नित्य ही हिन्दी में लिखेगा नहीं तब तक प्रगति मंद रहेगी। इस संबंध में हमारे मनीषियों का भी यही सुझाव है कि हिन्दी का विकास तभी संभव है जब यह शीघ्र विज्ञान, प्रौद्योगिकी एवं अनुसंधान की भाषा बन जाए। तो आइये, राज्यादेश की अनुपालना करने का संकल्प लें और हिन्दी माँ की गरिमा बढ़ायें।

मनोरंजन जगत को मालामाल करती हिंदी

आज हिंदी की व्यापक लोकप्रियता और इसे संप्रेषण के माध्यम के रूप में मिली आम स्वीकृति किसी संवैधानिक प्रावाधान या सरकारी दबाव का परिणाम नहीं है। मनोरंजन और फिल्म की दुनिया ने इसे व्यापार और आर्थिक लाभ की भाषा के रूप में जिस तरह विस्मयजनक रूप से शनैः शनैः स्थापित किया। उसने आज इसके पारंपरिक विरोधियों व उनके दुराग्रहों का मुंह बंद कर दिया है। आज हम स्पष्ट देख रहे हैं कि आर्थिक सुधारों व उदारीकरण के दौर में निजी पहल का जो चमत्कार हमारे सामने आया है इससे हम मानें या न मानें हिंदी दुनिया भर के दूरदराज़ के एक बड़े भू-भाग में समझी जाने वाली भाषा स्वतः बन गई है।

यदि हम पीछे मुड़कर देखें तो पाएंगे कि स्पीलबर्ग के ‘जुरासिक पार्क’ ने हमारे देश में जितना धन अपने हिंदी संस्करण से अर्जित किया वह इसके अँग्रेज़ी के मूल चित्र से दुगुने से अधिक था। यही हाल स्टार या बी.बी.सी. चैनल का है जो भारत में हिंदी कार्यक्रमों या वे सीरियल जो हिंदी में ‘वायस ओवर’ के द्वारा प्रसारित किए जा रहे हैं उनका महत्व समझता है। भाषा-स्थानांतरण दुनिया के उत्कृष्ट कार्यक्रमों को हिंदी के माध्यम से रातों-रात करोड़ों नए दर्शक दे रहा है। यह स्वतंत्र बाज़ार और प्रतिस्पर्धा का आज का स्वीकृत खेल है और अब भाषा को भावनात्मक विरोध का विषय बनाकर कुछ निजी राजनीतिक स्वार्थ से प्रेरित लोग हिंदी के प्रति विषवमन सरलता से नहीं कर पाएंगे।

राजभाषा के रूप में हिंदी को संशय से देखने वाला अँग्रेज़ी मीडिया का एक बड़ा वर्ग कितने ही पूर्वाग्रहों से ग्रस्त हो या मातृभाषा के रूप में हिंदी भाषी भी इसे संकोच या हीनता-भाव से बोले; सच तो यह है कि उपभोक्ता संस्कृति में, लाभ की भाषा, बिकने की भाषा, बाज़ार व विपणन की भाषा सबसे बड़ी होती है। हिन्दी की व्यावसायिक सामर्थ्य बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ भली-भाँति समझती है। कुछ साल पहले जब विख्यात पॉप स्टार मुंबई आए उस समय ‘मीडिया हाईप’ द्वारा अभूतपूर्व उत्साह उत्पन्न किया गया था अँग्रेज़ी के अखबार व चैनल इसे उस वर्ष की सबसे बड़ी सांस्कृतिक गतिविधि बनाना चाहते थे। यह भी प्रचारित किया गया कि वे कुछ पंक्तियाँ हिंदी में भी प्रस्तुत करेंगे। टाइम्स समूह के एक प्रमुख पत्र के प्रथम पृष्ठ के तीन कॉलम में फैले इस समाचार का शीर्षक था ‘माइकल जैक्सन का एक रॉक-शो हिंदी में।’ उसके बाद कई दिन तक जी.टी.वी. के समाचार में माइकल जैनसन को हिंदी में, थोड़ी मुश्किल से, यह बोलते दिखाया गया, ‘मैं आ रहा हूँ, यह मेरा वादा है। जो माइकल जैक्सन के अंतर्राष्ट्रीय आयोजक पेप्सिको हिंदी की ताकत को डालर में तौलने की क्षमता युक्त थे।

एक बात अवश्य है कि एक ओर हिंदी भाषा बाज़ार और मुनाफ़े की कुंजी बन रही है वहीं ‘हिंगलिश’, ‘इंडिक’, ‘बटलर’, ‘इंडिगी’, ‘भेल पुरी इंगलिश’, ‘बिरयानी इंगलिश’, ‘सींगलिश’ या ‘स्विच-स्वैप’ या ‘खिचड़ी इंगलिश’ को हमारा मीडिया अँग्रेज़ी के बचे खुचे दंभ की ओर ही इंगित करता है। हिंदी की सामर्थ्य स्वीकार करने के बाद भी भाँडों या विदूषकों की इस कृत्रिम भाषा से हिंदी की शालीनता, सक्षमता और प्रभावोत्पादकता से खिलवाड़ जारी है। श्रव्य-दृश्य मीडिया में हिंदी तो है पर इसी अघोषित लिपि रोमन हो गई है। ‘स्टार के हिंदी अवतार’ पर कुछ देश के ही समाचार पत्रों ने मीडिया जगत के बेताज बादशाह रूपर्ट मर्डोक के न्यूजकार्प के हिंदी प्रेम का मखौल भी उड़ाया था।

आज हालीवुड के फिल्म निर्माता भी भारत में अपनी विपणन नीति बदल चुके हैं। वे जानते है। कि यदि उनकी फिल्में हिंदी में रूपांतरित की जाएगी तो यहाँ से वे अपनी मूल अँग्रेज़ी में ‘निर्मित चित्रों’ के प्रदर्शन से कहीं अधिक मुनाफ़ा कमा सकेंगे। पश्चिमी फिल्मों के ‘ब्लाकबस्टर’ कहलाने वाली हिंदी ‘प्रिंटस’ की हमारे देश में जितनी खपत होती है वह अँग्रेज़ी ‘प्रिंटों’ की संख्या से कहीं अधिक है। इसमें यदि उन्हीं फिल्मों की भोजपुरी, तमिल या तेलगु भाषा की प्रिंटस की संख्या जोड़ी दी जाए तो आज मूल अँग्रेज़ी भाषा की फिल्मों की लोकप्रियता का भंडा स्वतः फूट जाता है।

सोनी पिक्चर्स के विक्रमजीत राम के अनुसार विदेशी फिल्मों की नई मजबूरी यह है कि अब वे भी ‘स्वदेशी तड़का’लगने से ही अधिक बिकती है । चाहे ‘स्पाइडर मैन 3’ हो, ‘कैसिनो रायल’ जैसी फिल्म हो अथवा ‘पाइरेट्स ऑफ द कैरेबियन’ या ‘हैरी पॉटर एण्ड द आर्डर ऑफ फीनिक्स’- इन सभी फिल्मों के हिंदी संस्करण का प्रदर्शन अँग्रेज़ी फिल्मों के अनुपात में कहीं अधिक हुआ है। ‘हिंदी में डबिंग’ किए हुए अँग्रेज़ी फिल्मों के इन संस्करणों ने उन्हें देश में लोकप्रियता के शिखर पर पहुँचाया है। उदाहरण के लिए अँग्रेज़ी फिल्म ‘कैसिनो रॉयल’ के देश के कुल 427 प्रिंटस में से मात्र 130 प्रिंट अँग्रेज़ी में और बाकी 297 प्रिंट हिंदी व भारतीय भाषाओं में थे। इस फिल्म ने बॉक्स आफिस पर 42करोड़ रुपये कमाए थे। ‘हाई हार्ड 3’ नामक फिल्म के हिंदी में 96 प्रिंटस बने जबकि अँग्रेज़ी में मात्र 50 प्रिंटस जारी किए गए ।

‘स्पाइडर 2’ ने देश में 35 करोड़ रुपये अर्जित किए थे। इसके 304 प्रिंटस में मात्र 94 प्रिंटस अँग्रेज़ी में थे। ‘स्पाइडर मैन3’ ने कुल 66 करोड़ रुपये का व्यवसाय किया था। इसके हिंदी प्रिंट के साथ-साथ भोजपुरी में भी 7 प्रिंटस बनाए गए थे। जिसके द्वारा इतना धन कमाया गया था कि फिल्म उद्योग से जुड़ेल लोग चकित थे। सूत्रों के अनुसार निकट भविष्य में जैकी चान की ऐक्शन व मारधाड़ वाली फिल्म ‘रश आवर 3’ की 100 प्रिंटस हिंदी में और मात्र 50 प्रिंटस अँग्रेज़ी में देश भर में दिखाए जाएंगे। हालीवुड की आज की वैश्विक बाज़ार की परिभाषा में हिंदी जानने वालों का महत्व सहसा बढ़ गया है। भारत को आकर्षित करने का उनका अर्थ अब उनकी दृष्टि में हिंदी भाषियों को भी उतना ही महत्व देना हैं। हमारे अँग्रेज़ी भक्त बुद्धिजीवी हिन्दी क्षेत्र को सदैव ‘काउबेल्ट’, ‘हिन्दी बैकपाएर्स’, ‘हिन्दी हिन्टरलैण्ड’ या पिछड़ी, सुप्त, गोबरपट्टी कहते नहीं अघाते हैं पर आज बाज़ार की भाषा ने हिंदी को अँग्रेज़ी की अनुचरी नहीं सहचरी बना दिया है।

अभी कुछ दिन पहले मुंबई की जानी मानी विज्ञापन एजेंसी के सर्वेक्षण द्वारा कुछ चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। देश में प्रकाशित मुद्रित विज्ञापन आज 70 प्रतिशत से अधिक अँग्रेज़ी में होते हैं और हिंदी पत्र-पत्रिकाओं को मात्र11.3 प्रतिशत विज्ञापन प्राप्त होते हैं। पर टी.वी. के विविध चैनलों में यह प्रतिशत उल्टा है। आज कुल मिलाकर टी.वी पर प्रसारित हिंदी विज्ञापनों का प्रतिशत 93.7 है। जबकि अँग्रेज़ी के विज्ञापन केवल 7 प्रतिशत हैं। आज टी.वी. देखने वालों की कुल अनुमानित संख्या जो लगभग 10 करोड़ मानी गई है उसमें हिंदी का ही वर्चस्व है। (नलेस)

प्रबंधन और हिन्दी

भाषाओं की नस-नस एक-दूसरे से गुथी हुई है

(मगर उलझी हुई नहीं)

हमारी साँस-साँस में उनका सौन्दर्य है

(मॉडर्निस टिक्) कहो मत

अभी हमें लड़ने दो

यब स्टेज महान

मूर्खों के लिए ही है

आह यह आधुनिक स्टेज

परिस्थितियाँ हीरो हैं

और यांत्रिक राजनीति हिरोइनें

कविता में आगे कहा है- इस नाटक के लिए

आधुनिकतम निर्देशक अमरीका से बुलाओ

और फ़्रांस से । और जापान से

तभी हम लिखेंगे और रक्त के समान उज्ज्वल

हमारी भाषाओं का तिलक होगा।।

(शमशेर)

एक बड़ा कवि आने वाले समय की हक़ीक़त को देख ही लेता है। आज हिन्दी को वैश्विक संदर्भ में देखने का हमारा नज़रिया अब पहले जैसा नहीं रहा है। पिछली पीढ़ी को इस बात की चिंता अधिक थी कि किस तरह हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र संघ में मान्यता मिल जाए और यह कह दिया जाए कि हाँ- तुम्हारी भाषा महान् और फिर हम सिर उठा कर कहें कि हिन्दी भाषा महान्। आज उस मान्यता के अध-खुले परदे दार दरवाज़े पर खड़े हम, दो प्रकार के लोगों में विभक्त हो गए हैं। एक वही पीढ़ी, जो इसे यानी हिन्दी को राष्ट्र संघ की मान्यता दिलवाना, अपने लंबे संघर्ष का परिणाम मानती है और एक वह नयी पीढ़ी जिसे इस बात का एहसास संभवतः है कि इसमें केवल बुज़ुर्गों का संघर्ष शामिल नहीं है, बल्कि अमरीका का अस्तित्व-संघर्ष भी ज़िम्मेदार है। अब हिन्दी राष्ट्र संघ की भाषा अवश्य बनेगी क्यों कि अब अमरीका को इसकी आवश्यकता है। हिन्दी का आगामी सम्मेलन न्यूयॉर्क में तय होना तथा अमरीका की राष्ट्रीय सुरक्षा नीति का 2007 जून से लाग होना निश्चय ही एक-दूसरे के साथ जुड़ी घटना के रूप में देखा जाना चाहिए। स्वतंत्रता के बाद क्या हम हिन्दी का वज़नदार थैला उठा कर चले थे जिसे  हमने संयुक्त राष्ट्र संघ के दरवाज़े पर ही छोड़ दिया और फिर घर आ कर धुंध और धूल में पड़ी अंग्रेज़ी को अपने आँचल से बड़े प्यार से, कुछ-कुछ अपराध-भाव से, साफ़ करने और सहलाने में लग गए।

आज आवश्यकता इस बात की है कि हम इस बात पर अपना ध्यान केन्द्रित करें कि कहीं कुछ ही समय के बाद थैले में पड़ी-पड़ी हमारी हिन्दी एक ख़ूबसूरत पैकिंग में किसी निश्चित पेकेज के साथ हमें एक विदेशी भाषा के रूप में पढ़ने की नौबत न आ जाए। वैश्वीकरण के इस युग में जब भाषा और लिपि यंत्र-बद्ध हो गयी है, कंप्यूटर टेक्नॉलॉजी और सॉफ़्टवैर प्रोग्रामिंग का इतना विकास हो गया है कि अब भाषा, उच्चारण, ध्वनियाँ, हिज्जे, व्याकरण – सर्व-जन-सुलभ हो गया है अतः उसमें किसी भी प्रकार के परिवर्तनों के लिए किसी की कोई बपौति नहीं है। कहीं ऐसी नौबत न आ जाए कि अँग्रेज़ीदाँ हमारी इस नई पीढ़ी को विदेशियों से हिन्दी भाषा को पढ़ना पड़े। अंग्रे़ज़ी के गढ़ में इंडियन इंग्लिश को जगह मिली अवश्य है, पर सर्जनात्मक स्तर पर। उनके प्रशासनिक कामकाज में भारतीयकृत अंग्रेज़ी को कोई स्थान नहीं है।

और अमरीका कोई यशोदा थोड़े ही हैं कि हौं तो धाय तिहारे सुत की, कृपा करत ही रहियो – कह कर हमारे सांस्कृतिक अधिकार को स्वीकार करेगा। बहु-सांस्कृतिकता वाद के इस दौर में टाट के तार-तार परदे के उस पार खड़ा है अमरीकी पठान तथा इस पार अपनी अस्मिता को बचाते वे देश तथा उनकी संस्कृति हैं, जो अमरीका के धन-वर्चस्व के सामने विवश नज़र आते हैं। तब तक कोई नया दार्शनिक सिद्धांत प्रचलित हो जाएगा जिसके तहत बहु-संस्कृति वाद के विरोधी अथवा आगे के कदम के रूप में विश्व-संस्कृति वाद की चर्चा होने लगेगी। इसके तहत यह कहा जाएगा कि चूँकि  संस्कृति- विधान, सामाजिक नियम तथा विधि-विधान मनुष्य की सुविधा के लिए बनाए गए हैं अतः सुविधाओं के बदलने के साथ-साथ सभी कुछ बदल जाता है अथवा तो बदल जाना चाहिए। अतः यह आग्रह करना ही व्यर्थ साबित हो जाएगा कि हाँ, हिन्दी हमारी है। हमारी भाषा के राज-सिंहासन पर बैठा दिलकश बाज़ार और खतरनाक शस्त्र कभी उससे अपना दिल बहलाएगा और कभी  वह खतरनाक शस्त्रों का जिरह-बख़्तर बन कर स्वयं अपने आप को लहुलुहान करती रहेगी।

विश्व मंच पर अब हिन्दी को एक सर्वथा नए विधान तथा नई चुनौतियों के साथ उपस्थित होना होगा। निश्चित् रूप से इन चुनौतियों का सामना हम नहीं करेंगे तो कोई और कर लेगा। क्योंकि वैश्वीकरण ने जिन उपकरणों का निर्माण किया है वे सभी के लिए हैं। इन चुनौतियों के कई स्वरूप हो सकते हैं। इसके अन्तर्गत हिन्दी कॉरपोरा- अर्थात् -कॉरपोरेट जगत और हिन्दी, हिन्दी कंप्यूटिंग, हिन्दी प्रबंधन आदि की बात की जा सकती है। हिन्दी भाषा प्रौद्योगिकी की गहरी उपस्थिति से यह बात अब नई नहीं रही कि भाषा भी अब एक विकास का, भौतिक विकास का उपकरण बन गयी है। वह भाषा जो आध्यात्मिक, नैतिक, संवेदनात्मक अभिव्यक्ति का माध्यम थी और है वह अब भौतिक विकास का भी साधन है। हिन्दी भाषा की यह माध्यम से साधन तक की गति का ही परिणाम है कि अब उसके बारे में नए ढंग से सोचने में अगर विलंब हुआ तो विश्व मंच पर हमारी भूमिका एक दर्शक-भर की रह जाएगी।

इस प्रपत्र के माध्यम से मैं हिन्दी और प्रबंधन के संदर्भ में कुछ सह-चिंतन करने का उपक्रम करना चाहती हूँ। यह एक ऐसा क्षेत्र है जिस पर अभी विशेष सोचा नहीं गया है। पहली बार सन् 1995-96 में जब भारतीय प्रबंध संस्थान अहमदाबाद से मुझे यह कहा गया कि हमें हिन्दी में काम कर सके ऐसे एक व्यक्ति की नियुक्ति करनी है, पर स्थाई नहीं क्योंकि हमारे यहाँ हिन्दी का क्या काम। पर चूँकि सरकार का यह नियम और आग्रह है अतः हमें किसी को रखना होगा। हम उस पर अधिक धन नहीं खर्च करना चाहते। तब तात्कालिक प्रतिक्रिया के रूप में मैंने यह कहा था कि आप का सोचना गलत है क्योंकि अब आपको इसकी आवश्यकता पड़ेगी। प्रबंधन में जब हमारे पास इतनी बड़ी और ख्याति-प्राप्त संस्था है तब इसके द्वारा ही हम हिन्दी की और प्रकारांतर से भारत की स्थिति विश्व में दृढ कर सकते हैं। एक सहज हिन्दी-प्रेम के कारण मेरे मन में यह बात दृढ होती गयी कि हिन्दी को लेकर यह उपेक्षा का भाव किसी भी क़ीमत पर दूर होना चाहिए। समय समय का काम करता है और जैसा कि कवि ने कहा है कि विश्व मंच पर नायिका राजनीति का ऐसा कमाल हुआ कि सन् 2007 जनवरी में विश्व हिन्दी उत्सव में बोलते हुए मैनेजमैंट गुरु श्री अरिंदन चौधरी ने कहा कि प्रबंधन के व्यावहारिक क्षेत्र में न अंग्रेजी चलती है न ही मातृ भाषा, वहाँ तो केवल हिन्दी ही चलती है। अरिंदन चौधरी के इस कथन ने मुझे बाध्य किया कि मैं अपनी उस बात को क्रिया- रुप में ढालूं। इस हेतु से प्रबंधन के पाठ्य क्रम में हिन्दी को कैसे स्थान मिल  सकता है, उसे किस प्रकार उसमें शामिल किया जा सकता है उस पर थोड़ा सोचा है। इस संदर्भ में मैंने प्रबंधन पाठ्यक्रम पढ़ाने वाले युवा पीढ़ी के अध्यापकों को तथा गुजरात और गुजरात बाहर के कुछ विद्यार्थियों से भी बातचीत की है। सभी इस बात से सहमत थे कि हिन्दी को प्रबंधन पाठ्यक्रम में लाना उचित होगा। इस बात को दो-तरफा देखा जा सकता है। हिन्दी पाठ्यक्रमों में प्रबंधन और प्रबंधन के पाठ्यक्रमों में हिन्दी।

हिन्दी पाठ्यक्रमों में प्रबंधन

इस के अन्तर्गत  पाठ्यक्रम के परंपरागत युनिट्स को प्रबंधन की दृष्टि से पढ़ाया जा सकता है। जैसे रामचरितमानस का सोश्यल एंड फैमिली बिहेव्रियल मैनेजमैंट की दृष्टि से अध्ययन किया जा सकता है। चूँकि रीतिकालीन कविता में धन-प्राप्ति कवियों का एक प्रमुख उद्देश्य रहा था। साथ ही परंपरागत रूप से हीन काव्य के रूप में जाना जाने वाला चित्र-काव्य उसमें बहुतायत से लिखा गया था। वह अपने स्वरूप तथा प्रकृति में विज्ञापन की दृष्टि से नए ढंग से पढ़ाया जा सकता है। प्रयोजन मूलक पाठ्यक्रमों में, इस दृष्टि से रीतिकाल का अध्ययन किया जा सकता है। इसके अलावा अन्य विषयों पर भी सोचा जा सकता है। आज यह इसलिए भी ज़रूरी हो गया है क्योंकि समाज तथा व्यवहार-जगत में स्पष्ट दिखाई पड़ते मूल्य-ह्रास तथा मूल्य-परिवर्तन तथा बाज़ार की अंधी तथा तेज़ दौड़ में हमारे परंपरागत साहित्य के पाठ्यक्रमों पर एक प्रश्न-चिह्न लगता जा रहा है। अंग्रेज़ी के पाठ्यक्रमों में प्रयोजन मूलक, भाषा तथा साहित्य के पाठ्यक्रमों सें किसी भी प्रकार का संघर्ष इसलिए नहीं दिखाई पड़ता क्योंकि वहाँ सोच का लचीलापन अधिक है और साथ ही शाश्वतता के भ्रम-मूलक विचारों से वे मुक्त हैं। अथवा टिके रहने के लिए वे आगे बढ़ने में किसी भी प्रकार का परहेज़ नहीं करते। 

प्रबंधन के पाठ्यक्रमों में हिन्दी

प्रबंधन के पाठ्यक्रम का एक उद्देश्य यह है कि उत्पादन तथा कार्य विधि (ऑपरेशनल) की दृष्टि से नए विषयों को इसमें जोड़ा जाए। चूँकि उत्पादन का अंतिम सिरा ग्राहक है, अतः ग्राहक की भाषा अपने आप में महत्वपूर्ण हो जाती है। कार्य विधि का संबंध भी केवल अंग्रेज़ी के जानकारों या किसी एक भाषा विशेष के जानकारों की बपौती नहीं है,अतः इस पाठ्य क्रम में हिन्दी के समावेश की स्थति सहज ही बनती है, जहाँ तक भारत जैसे देश का प्रश्न है। 

अगर प्रबंधन को प्रभावक बनाना है(इफेक्टिव मैनेजमैंट) तो हिन्दी से बेहतर कोई भाषा काम नहीं आ सकती। प्रबंधन की प्रकृति तथा संभावनाओं में यह एक पाठ्य बिन्दु है।

      नए लोगों की नियुक्ति में भाषा का एक महत्वपूर्ण रोल है। बीरबल की उस कथा को याद रखना चाहिए कि व्यक्ति आपत् काल में केवल अनी भाषा में ही अभिव्यक्त होता है। तथा जब उसे औचक पकड़ना हो तब केवल उसकी अपनी भाषा के द्वारा ही ऐसा संभव हो पाता है। देश के संदर्भ में भी यह सच है। आपत् काल में किसी भी देश की नब्ज को उसकी भाषा के द्वारा ही समझा जा सकता है। ख़ास कर जब वह एक लोकतांत्रिक देश हो।

      किसी भी संस्थान में नियुक्ति के लिए जो परीक्षाएं ली जाती हैं उनमें उसका विषय गत ज्ञान अवश्य ही अंग्रेजी में मालूम किया जा सकता है। परन्तु व्यक्ति की आंतरिक ताकत,  उसके स्वभाव तथा उसके चरित्र का वास्तविक परीक्षण उसकी अपनी भाषा में उससे बातचीत कर के ही लिया जा सकता है। परीक्षण का यही आधार किसी भी कंपनी की उन्नति  का आधार बन सकता है।

      मार्केटिंग, विज्ञापन, औद्योगिक संबंध एवं निजी प्रबंधन कुछ ऐसे क्षेत्र हैं जहाँ हिन्दी की एक महत्व पूर्ण भूमिका है। प्रबंधन में अब तक प्रयुक्त परंपरागत भाषा अंग्रेज़ी का तुलना में हिन्दी किस तरह बेहतर परिणाम ला सकती है,ऐसे विषयों पर शोध करवाने चाहिए ताकि वस्तु स्थिति का पता चल सकता है।

      इनमें सबसे मौजूं तथा महत्वपूर्ण मुद्दा नेतृत्व एवं संप्रेषण का है। जैसे कम्युनिकेशन स्किल्स इन इंग्लिश का चलन है,  वैसे अब कम्युनिकेशन स्किल्स इन हिन्दी का समय आने वाला है। बल्कि आ गया है। हमारी सरकार भले ही अंग्रेज़ी पर भार रख कर अनेक आयोजन कर रही है। इस बात की चिंता कर रही है कि उसके कर्मचारी अच्छी अंग्रेजी में बात करें। पर इस मामले में तो यही कहा जा सकता है कि हमारी नींद देर से खुली है। वह समय पीछे निकल चुका है और हम अपने उसी पुराने समय के अनुसार जीवन जी रहे हैं। छठी शताब्दी में जगे बुद्ध 21 वीं शताब्दी में छठी शताब्दी के अनुसार रहेंगे तो पिछड़े ही कहलाएंगे। अब तो समय भारत के लिए हिन्दी का ही है। अगर राष्ट्र-प्रेम नहीं तो बाज़ार ही इस बात को सिखलाएगा तथा सिद्ध करेगा।  

      नेतृत्व तभी सफल होता है जब अपनी भाषा में किया जाता है। सोनिया गांधी तथा लालू प्रसाद जी इसके अच्छे उदाहरण है।

      यह कुछ आरंभिक सोच है जिस पर भविष्य में काम करने की इच्छा है।

संयुक्त राष्ट्र में हिन्दी को लाने का समय

संयुक्त राष्ट्र में हिन्दी को लाने का यह अनुकूल समय है। भारत सरकार को केवल डेढ़ करोड़ डॉलर प्रतिवर्ष खर्च करने होंगे, संयुक्त राष्ट्र के आधे से अधिक सदस्यों की सहमति लेनी होगी और उसकी कामकाज नियमावली की धारा -51 संशोधन करवाकर हिंदी का नाम जुड़वाना होगा। इस मुद्दे पर देश के प्रायः सभी राजनीतिक दल भी सहमत हैं।

कौन भारतीय है, जो अपने राष्ट्र की भाषा को विश्व-मंच पर दमकते हुए देखना नहीं चाहेगा। जिन भारतीयों को अपने प्रांतों में हिंदी के बढ़ते हुए वर्चस्व पर कुछ आपत्ति है, वे भी संयुक्त राष्ट्र में  हिन्दी लाने का विरोध नहीं करेंगे,क्योंकि वे जानते हैं कि विश्व मंच पर 19 भाषाएँ भारत का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकतीं। वे यह बर्दाश्त नहीं कर सकते कि विश्व-मंच पर भारत ‘गूँगा’ बनकर बैठा रहे। अगर हमने संयुक्त राष्ट्र में पहले हिन्दी बैठा रहे । अगर हमने संयुक्त राष्ट्र में पहले हिंदी बिठा दी, तो हमें सुरक्षा परिषद में बैठना अधिक आसान हो जाएगा।

1945 में संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषाएँ केवल चार थीं। अँग्रेज़ी, रूसी, फ्रांसीसी और चीनी । सिर्फ ये चार इसलिए क्योंकि ये पाँच विजेता महाशक्तियों की भाषाएँ थीं । अमेरिका और ब्रिटेन दोनों की अँग्रेज़ी, रूस की रूसी,फ्रांस की फ्रांसीसी और चीन की चीनी। इन भाषाओं के मुकाबले इतालवी, जर्मन जर्मनी, जापानी आदि भाषाएँ किसी तरह कमतर नहीं थी, लेकिन वे विजित राष्ट्रों की भाषाएँ थीं। यानी जिस भाषा के हाथों तलवार थी, ताकत थी,विजय-पताका थी, वही  सिंहासन पर जा बैठी। क्या अब 62 साल बाद भी यही ताकत का तर्क चलेगा।

1945 में जो चार भाषाएँ संयुक्त राष्ट्र की अधिकृत भाषाएँ बनीं, उनमें 1973 में दो भाषाएँ और जुड़ीं। हिस्पानी और अरबी ! इन दोनों भाषाओं को संयुक्त राष्ट्र में शक्ति बल के कारण नहीं, संख्या बल के कारण मान्यता मिली।

हिंदी को तो पता नहीं, किन-किन बलों के कारण मान्यता मिलनी चाहिए। सबसे पहला कारण तो यह है कि हिंदी को मान्यता देकर संयुक्त राष्ट्र अपनी ही मान्यता का विस्तार करेगा । उसके लोकतंत्रीकरण की प्रक्रिया का यह शुभारम्भ माना जाएगा। 62 साल से विजेता और विजित के खाँचे में फँसी हुई संयुक्त राष्ट्र की छवि का परिष्कार होगा। दूसरा, दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र दुनिया के दूसरे के सबसे बड़े लोकतंत्र, दुनिया के दूसरे सबसे बड़े देश और  दुनिया के चौथे सबसे मलादार देश की भाषा को मान्यता देकर संयुक्त राष्ट्र अपना गौरव खुद बढ़एगा। तीसरा, हिंदी को मान्यता देने का अर्थ है-तीसरी दुनिया और गुटनिरपेक्ष राष्ट्रों को सम्मान देना। भारत इन राष्ट्रों का नेतृत्व करता रहा है।

चौथा, हिंदी विश्व की  सबसे अधिक समझी और बोली जाने वाली भाषा है। संयुक्त राष्ट्र की इन भाषाओं में चीन की अधिकृत भाषा ‘मेंडारिन’ को बोलने-समझने वालों की संख्या विभिन्न भाषाई-विश्व कोशों में लगभग 85 करोड़ बताई जाती है। उसे 100 करोड़ भी बताया जा सकता है, लेकिन असलियत क्या है ? असलियत के बारे में बहुत-से मतभेद हैं। चीन में दर्जनों स्थानीय भाषाएँ हैं। उन्हें लोग दुभाषियों के बिना समझ ही नहीं पाते । मैं स्वयं 8-10 बार चीन घूम चुका हूँ। एक-एक माह वहाँ रहा हूँ। मुझे कई बार दो-दो तरह के दुभाषिए एक साथ रखने पड़ते थे। अगर यह मान लें कि दुनिया में चीनी भाषियों की संख्या एक अरब है, तो भी इससे हिंदी पिछड़ नहीं जाती। आज हिंदी भाषियों की संख्या एक अरब है, तो भी ज्यादा है। सिनेमा और टीवी चैनलों की कृपा से अब लगभग सारे भारत के लोग हिन्दी समझ लेते हैं। और ज़रूरत पड़ने पर बोल भी लेते हैं। अगर मान लें कि दक्षिण भारत के 10-15 करोड़ लोगों को हिंदी के व्यावहार में अब भी कठिनाई है, तो उसकी भरपाई ‘दक्षेस’ के अन्य सात राष्ट्रों में बसे लगभग 35 करोड़ लोग कर देते हैं। उनमें से ज्यादातर हिंदी समझते हैं। उनके अलावा विदेशों में बसे दो करोड़ से ज्यादा भारतीय भी हिंदी का प्रयोग सगर्व करते हैं। संयुक्त राष्ट्र में हिंदी को प्रतिष्ठित करना दुनिया के लगभग डेढ़ अरब लोगों को प्रतिनिधित्व देना है।

पाँचवाँ, हिंदी जितने राष्ट्रों की बहुसंख्यक जनता द्वारा बोली-समझी जाती है, संयुक्त राष्ट्र की पहली चार भाषाएँ नहीं बोली-समझी जाती हैं। यह ठीक है कि अँग्रेज़ी, फ्रांसीसी और रूसी ऐसी भाषाएँ हैं, जिन्हें ब्रिटेन, फांस और रूस के दर्जनों उपनिवेशों में बोला जाता रहा है, लेकिन ये भाषाएँ उन उपनिवेशों के दो-चार प्रतिशत से ज्यादा लोग आज भी नहीं बोलते, जबकि हिंदी भारत ही नहीं, पाकिस्तान, नेपाल, मॉरिशस, ट्रिनि़डाड, सूरीनाम, फिजी, गुयाना,बांग्लादेश आदि देशों की बहुसंख्यक जनता द्वारा बोली और समझी जाती है। जब इस बहुराष्ट्रीय भाषा में संयुक्त राष्ट्र की गतिविधियाँ टीवी पर सुनाई देगी, तो सोचिए कि कितने लोगों और व्यापार राष्ट्रों का संयुक्त राष्ट्र के प्रति जुड़ाव बढ़ता जाएगा।

छठा, यदि हिंदी संयुक्त राष्ट्र में प्रतिष्ठित होगी, तो दुनिया की अन्य सैंकड़ों भाषाओं के लिए शब्दों का नया ख़जाना खुल पड़ेगा। हिंदी संस्कृत की बेटी है। संस्कृत की एक-एक धातु से कई-कई हजार शब्द बनते हैं। एशिययाई और अफ्रीकी ही नहीं, युरोपीय और अमेरिकी भाषाओं में भी आजकल शब्दों का टोटा पड़ा रहता है अन्तरराष्ट्रीय विज्ञान और व्यापार के कारण रोज नए शब्दों की जरूरत बड़ती है। इस कमी को हिंदी पूरा करेगी।

सातवाँ, हिंदी के संयुक्त राष्ट्र में पहुंचते ही दुनिया की दर्जनों भाषाओं को लिबास मिलेगा। वे निवर्सन हैं। उनकी अपनी कोई लिपि नहीं है। तुर्की, इंडोनेशियाई, मंगोल, उज्बेक, स्वाहिली, गोरानी आदि भाषाएँ विदेशी विपियों में लिखी जाती हैं। मजबूरी है। हिंदी इस मजबूरी को विश्व-स्तर पर दूर करेगी। वह रोमन, रूसी और चित्र-लिपियों का शानदार विकल्प बनेगी। उसकी लिपि सरल और वैज्ञानिक है। जो बोलो, सो लिखो और जो लिखो, सो बोलो। संयुक्त राष्ट्र में बैठी हिंदी विश्व के भाषाई मानचित्र को बदल देगी।

यदि हिंदी संयुक्त राष्ट्र में दनदनाने लगी, तो उसके पास ठोस परिणाम सामने आएँगे। पहला, भारतीय नौकरशाही-नेताशाही को मानसिक गुलामी से मुक्ति मिलेगी। भारत के राजकाज में हिंदी को उचित स्थान मिलेगा। दूसरा,भारतीय भाषाओं की जन्मजात एकता में वृद्धि होगी। तीसरा, ‘दक्षेस’ राष्ट्रों में ‘संगच्छध्वं संवद्ध्व’ का भाव फैलेगा । जनता से जनता का जुड़ाव बढ़ेगा। तीसरा, वैश्वीकरण की  प्रक्रिया में अँग्रेज़ी का संशक्त विकल्प तैयार होगा। चौथा, स्वभाषाओं के ज़रिए होने वाले शिक्षण, प्रशिक्षण और अनुसंधान की गति तीव्र होगी। उसके कारण भारत ‘दिन-दूनी रात चौगुनी’ उन्नति करेगा । सचमुच वह विश्व-शक्ति और विश्व-गुरू बनेगा।

 

‘भाषा किसी देश की अस्मिता की द्योतक होती है। भाषा अभिव्यक्ति का माध्यम न होकर समूची संस्कृति को स्पष्ट करने का आईना भी होती है। भाषा न केवल विचारों के आदान-प्रदान का साधन भर है, अपितु वह पूरी की पूरी परम्परा की संवाहक भी होती है।’ किसी देश और राष्ट्र के स्वरूप तथा स्वाभिमान को अभिव्यक्ति देने का नाम भाषा है। भाषा देश के इतिहास एवं वर्तमान का वह आईना होती है, जिसमें भविष्य भी देखा जा सकता है।

भारत की स्वतन्त्रता के यज्ञ में जिन महापुरुषों ने आहुतियाँ  डाली थीं, उन सबने तब ही यह अनुमान लगा लिया था कि भारत के ‘राष्ट्र-देव’ को जगाना है तो ‘हिन्दी के मन्त्र’ को प्रखर करना होगा। इसी हिन्दी-मन्त्र का आधार लेकर महानायक सुभाषचन्द्र बोस ने आजाद हिन्द फौज जैसी विशाल सेना खड़ी कर हिन्दुस्तान की आजादी का सपना देखा। इसी हिन्दी-मन्त्र को साध कर महात्मा गाँधी ने स्वतन्त्रता की लड़ाई में सारे भारत को एकजुट कर लिया और जीत हासिल की।   हिन्दी-मन्त्र का यह स्वर स्वतन्त्रता की पहली लड़ाई के दौर में ही गूंजने लगा था, जिसको शक्ति दी थी कलम के योध्दा भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने। भारतेन्दु ने पहली बार ‘निज भाषा उन्नति अहै सब उन्न्ति को मूल’कहकर इसकी क्षमता को पहचानने का आव्हान किया था। स्वतन्त्रता आन्दोलन के उस दौर में हिन्दी ने जो लोकप्रियता हासिल की थी, वही आज यदि बरकरार रहती तो भारत का सांस्कृतिक परिदृश्य कुछ और होता। आज का युवा जिस सम्भ्रम की स्थित से गुजर रहा है, उससे भिन्न वह एक ठोस धरातल पर खड़ा होता।अपनी भाषा,अपनी संस्कृति और अपना इतिहास ही व्यक्ति को अपनी निजता की पहचान कराते हैं, अभिमान तथा स्वाभिमान जगाते हैं। अभिमान और स्वाभिमान की धरती के अभाव में आकाशीय ऊंचाईयों को छूने का उपक्रम पूरी तरह से सफल नहीं हो पाता, प्रयत्न भी कुछ अधिक ही करना पड़ता है।सच तो यह है कि भारतीय जन-मानस अपने ‘स्वत्व’को न पहचान सके, इसकी परिकल्पना अंग्रेजो ने वर्षों पूर्व कर ली थी। ईस्ट इंडिया कम्पनी ने अपने आप को अधिक समर्थ बनाने के लिए एक ‘भाषा-नीति’ बनायी थी। अपने सैनिकों को प्रशिक्षित करने के लिए कम्पनी ने ‘ओरिएण्टल सेमिनरी’ नामक संस्था की स्थापना की थी जो आगे चलकर ‘फोर्ट विलियम कॉलेज’ के रूप में प्रसिद्ध हुई। भारत की’उच्च शिक्षा नीति’ का केन्द्र यही फोर्ट विलियम कॉलेज था। 4 मई 1800 ई. को स्थापित ‘ओरिएण्टल सेमिनरी’ के प्रथम अध्यक्ष गिल क्राइस्ट थे, जो उर्दू के पक्षधर थे, अतः उन्होंने हिन्दी के नाम पर उर्दू को अपनाया। अपनी राजनीतिक चाल के तहत भारत के तत्कालीन राजकाज की भाषा फारसी को अपदस्थ करके अंग्रेजो ने अँगरेज़ी को राजभाषा तथा सम्भ्रान्त भारतीयों के लिए सम्पर्क भाषा के रूप में मान्यता दे दी। अंग्रेजो की भाषा-नीति निश्चित ही शैक्षिक हितों के मद्देनज़र नहीं थी। राजनीतिक हित-साधन का माध्यम बनी इसी नीति के तहत अंग्रेजों ने हिन्दी के नाम पर उर्दू को प्रोत्साहित किया, जिसका परिणाम यह निकला कि हिन्दी और उर्दू भाषियों के मध्य खींचातानी बढ़ी। भाषायी तनाव के माध्यम से अंग्रेजों ने साम्प्रदायिक वैमनस्य का बीज भी बड़ी कुशलता के साथ बो दिया था।

उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक दौर से ही अँगरेज़ी आकाओं के प्रयत्नों से सम्पूर्ण देश में अँगरेज़ी माध्यम के मिशनरी स्कूलों का जाल बिछता गया, भारत की क्षेत्रीय भाषाएँ किनारे कर दी गयीं, हिन्दी का महत्व घटता गया और भारत का जन-मानस न केवल राजनीतिक स्तर पर, अपितु भाषा एवं संस्कृति के स्तर पर भी गुलामी की जगड़ में जकड़ता गया। भाषा को आधार बनाकर किसी समध्द-सुसंस्कृत राष्ट्र को पूरी तरह ‘गुलाम’ बना लिये जाने का यह एक अद्वितीय उदाहरण है।

हिन्दी भाषा अपनी अन्य सहोदरा भाषाओं के साथ अँगरेज़ी के साथ अँगरेज़ी के दबाव में ऐसी दबी कि आज लगभग60 वर्षों के बाद भी उससे निजात पाना असम्भव प्रतीत होता है। हमारी भाषाएँ भाषायी गुलामी रूपी रेत के दलदल में फस गयी हैं। स्वतन्त्रता आन्दोलन में अगुआ बनी हिन्दी ‘राजभाषा’ तथा ‘राष्ट्रभाषा’ के नाम पर हंसी का मुद्दा बन कर हमें आईने के सामने खड़ी कर चुकी है। आचार्य विष्णुकान्त शास्त्री की प्रसिद्ध पंक्तियाँ हैं। ‘राजभाषा के रूप में हिन्दी के विकास की जितनी सम्भावनाएँ थीं, दुर्भाग्य और दुश्चक्र के कारण वे मूर्त नहीं हो सकीं। पहले राजभाषा के रूप में हिन्दी की प्रतिष्ठा की तैयारी के लिए पन्द्रह वर्ष का समय निश्चित किया गया। पन्द्रह वर्ष बाद हिन्दी राजभाषा के रूप में प्रयुक्त हो, इसके लिए उच्च प्रशासकीय अधिकारियों की मानसिक तैयारी नहीं की गयी। अँगरेज़ी को चलते रहने दिया गया। हिन्दी को जानबूझकर उपेक्षा की गयी। पन्द्रह वर्षों के बाद हिन्दी विरोध का आन्दोलन राजनीतिक कारणों से दक्षिण भारत में उग्रतापूर्वक एवं उत्तर पूर्व भारत में सामान्य रूप से छेड़ा गया और उसके बाद यह घोषणा कर दी गयी कि अँगरेज़ी तब तक राजभाषा के रूप में चलती रहेगी, जब तक एक भी राज्य ऐसा चाहेगा। इसका मतलब यह हुआ कि देश के लगभग सभी प्रमुख राज्य भी अगर हिन्दी को ही राजभाषा मानने को तैयार हों और नागालैण्ड या मेघालय जैसा छोटा राज्य भी अँगरेज़ी की माँग करे तो अँगरेज़ी को राजभाषा के पद से हटाया नहीं जा सकता। इसके कारण उच्च प्रशासनिक अधिकारियों के मन में यह बात जम गई कि अँगरेज़ी अनन्त काल तक राजभाषा के रूप में चलती रहेगी। अतः राजभाषा के रूप में हिन्दी की गति अवरुध्द सी हो गयी’। अंग्रेजों के जाने के बाद अंग्रेजियत से भरी मानसिकता के चलते हिन्दी को हम वह स्थान कभी नहीं दे पाये, जिसकी वह अधिकारिणी थी। हमने न तो टर्की के कमाल पाशा से कोई सबक लिया, न ही हिब्रू जैसी मातृभाषा को पुनर्जीवित कर अपने आप को गौरवशाली मानने वाले इज़राइलियों से कोई सीख ली। हमने राजनीतिक इच्छाशक्ति के अभाव में हिन्दी जैसी सर्वप्रिय, सर्वसुलभ भाषा को दोयम दर्जे का बनाकर रख छोड़ा है।

भौतिक शास्त्र का एक नियम है कि किसी पदार्थ पर जितना अधिक दबाव डाला जाता है, वह उतना ही ऊपर उठकर आता है। न्यूटन के तीसरे सिध्दान्त के रूप में ज्ञात यह वैज्ञानिक नियम निश्चित रूप से आज ‘हिन्दी’ भाषा पर लागू हो रहा है। ‘हिन्दी’ को जितना अधिक दबा-कुचला रखा गया, वह उतनी ही उभर कर आज अपने महति अस्तित्व को विश्व-पटल पर उजागर कर रही है।हिन्दी एक बेहद लचीली, सहज-सम्भ्रान्त भाषा है। वहिन्दी : करवट लेती नयी चुनौतियाँर्षों पूर्व मध्यकाल में भी इसने अरबी-फारसी और तुर्की भाषाओं के दबाव को बेहद संजीदगी के साथ झेला और उन विदेशी भाषाओं के अनेकानेक शब्दों को आत्मसात करके स्वयं और भी अधिक सशक्त बनी। यह तो सर्वविदित है ही कि अरबी-फारसी और तुर्की भाषाओं के साथ हिन्दी की बोलियों के सह-अस्तित्व के परिणाम स्वरूप ही उर्दू भाषा का जन्म हुआ।

बीसवीं शताब्दी के अन्तिम वर्षों से ‘सूचना क्रान्ति’ के तहत सम्पूर्ण विश्व में अभूतपूर्व एकीकरण हुआ। ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भारतीय उक्ति युगों बाद ‘वैश्विक ग्राम’ के रूप में साकार हुई सी लगती है। वैश्विकीकरण के इस दौर में हिन्दी भाषा ने भी एक नयी करवट ली है। आज सम्पूर्ण विश्व की दृष्टि एक व्यापार केन्द्र के रूप में भारत पर है। उत्साहजनक स्थिति यह है कि इस व्यापार की भाषा हिन्दी बनती जा रही है। भारत ने व्यापार के माध्यम से अपनी प्राचीन संस्कृति को मध्य एशिया, योरोप और चीन तक फैलाया है। आज भी यही व्यापार भिन्न रूप में न केवल भारतीय संस्कृति का प्रचार-प्रसार कर रहा है, हिन्दी भाषा के विकास में भी महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है।

‘वैश्विक बाजारवाद’ के चाहे कितने ही दुष्परिणाम गिनाये जाएँ, उसका एक ही लाभ उन सबसे ऊपर स्थापित होने को पर्याप्त है कि उसके कारण हिन्दी भाषा आज वैश्विक पटल पर छा रही है। अमेरिका के राष्ट्रपति बुश कहते हैं कि हिन्दी सीखों और भारत के साथ व्यापार करो। कुछ पूर्वी देशों में हिन्दी सीखने की होड़ लग गयी है। वे लोग भारत आकर काम धन्धा करना चाहते हैं।भारत के भीतर की बात करें तो आज दक्षिण भारतीय हों या पूर्वी भारतीय,गुज़राती हों या कश्मीरी, हर प्रान्त के लोग आज काम के सिलसिले में या व्यापार के खातिर हिन्दी सीख रहे हैं। इसके विपरीत धुर दक्षिणी प्रान्तों के बैंगलोर, मैसूर, हैदराबाद जैसे अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति के सूचना प्रौद्योगिक केन्द्रों में हिन्दी क्षेत्र के विशेषज्ञों का जाना और वहाँ  रहकर काम करने में हिन्दी एक वैचारिक समरसता का पुल सिद्ध हो रही है।   अमेरिकी बाजारों या योरोप का अगोरा, पूरब का हाट हो या चीन की दुकान, हर कोई अब भारत आने को उत्सुक है और भारत आने की पहली सीढ़ी के रूप में वह ‘हिन्दी’ को देखता है। बड़ी-बड़ी बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ  अपना उत्पादन बेचने के लिए आज ‘हिन्दी’ का ही सहारा ले रही हैं। पेप्सी हो या पिज्जा, नूडल्स हो या बर्गर, तेल-क्रीम हो या मोटर साइकल हर वस्तु की बिक्री आज हिन्दी के माध्यम से हो रही है। अधिक लोगों तक जाना, अधिक बिक्री का आधार है। अधिक लोग हिन्दी समझते हैं तो बिक्री की भाषा भी हिन्दी ही होगी।आज का युग विशेषज्ञता का है। हर कहीं, हर कोई अधिक से अधिक श्रेष्ठता अर्जित करके अपने आपको स्थापित करने के प्रयास में जुटा है। आधुनिक तकनीक के द्वारा सूचना प्रेषित करने का माध्यम एसएमएस और ई-मेल भी आज हिन्दी के रथ पर सवार हो चुके हैं। विदेशों में रहने वाले हजारों युवा जब कम्प्यूटर के जरिए भारत में अपनी माँ  या बहन से बातचीत करते हैं तो वह हिन्दी में होती है। अभी यह बातचीत रोमन लिपि में होती है, किन्तु वह दिन दूर नहीं जब देवनागरी लिपि भी अपना दबदबा कायम कर लेगी।

दबाव में जीने की आदी हो चुकी ‘हिन्दी’ के लिए ये नवीन परिस्थितियाँ  रेश्मी उजास से भरपूर सुबह के सुखद स्वप्न की तरह है, जो स्वप्न नहीं सच में तब्दील हो रहा है। हिन्दी भाषा के विकास की चिन्ता करने वालों के लिए यह परिदृश्य उत्साहजनक आवश्यक है। फिर भी इन तमाम खुशफहमियों के बीच कुछेक शंका-कुशंका के बादल हिन्दी के आसपास मंडरा रहे हैं, जिन्हें नज़र अन्दाज नहीं किया जा सकता। बाजारवाद से उभरती हिन्दी भाषा के सम्मुख आज निश्चित ही भिन्न प्रकार की चुनौतियाँ  आ खड़ी हुई हैं। एक ओर उसके विस्तार और विकास का आनन्द है, तो दूसरी ओर भाषायी प्रदूषण का भय भी बढ़ता जा रहा है। तमाम अन्य क्षेत्रों में जैसे बाजारवाद का प्रदूषण फैल रहा है,वैसे ही भाषा में भी इसके कई-कई रूप समाते जा रहे हैं। शुध्दि-अशुध्दि से भी आगे बढ़कर भाषा का संकुचन,विस्तार से बचने की प्रवृत्ति, लेखन में कोताही, सरलीकरण तथा इन जैसे और भी अनेकानेक दुष्प्रभाव धीरे-धीरे स्पष्ट होंगे, जिनके लिए ‘हिन्दी’ भाषा के पुरोधाओं को पहले से ही मोर्चा संभालना आवश्यक हो जायेगा।   इन सब नयी चुनौतियों के साथ भारत का जन-मानस यदि आत्म-सम्मान और स्वाभिमान के साथ हिन्दी को ‘अपनी भाषा’का स्थान देगा तो निश्चित ही हिन्दी अपनी तमाम विरोधाभासी परिस्थितियों के जाल-जंजाल से ऊपर उठकर कमल वत खिल उठेगी। अब वैश्विक स्तर पर हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र की अधिकारिक भाषा के रूप में मान्यता मिलने की उम्मीद है। संयुक्तराष्ट्र के मुख्यालय न्यूयार्क में हो रहे आठवें विश्व हिन्दी सम्मेलन में यह उम्मीद फिर जाग उठी है।

हिन्दी भाषा ‘भारती’ का भविष्य

प्रायः प्रत्येक हिन्दीभाषी हिन्दी को एक विश्वभाषा के रूप में देखना चाहता है, लेकिन स्थिति यह है कि भारत के हिन्दी क्षेत्र में ही यह भाषा अपने अस्मिता की रक्षा के लिए संघर्षरत है। इसकी उपादेयता पर भी प्रश्नचिन्ह लग चुका है। यही कारण है कि विपन्न वर्ग के जन भी अत्यंत त्याग कर अपने बच्चों को अँगरेज़ी माध्यम में शिक्षा दिलवाते हैं। विकल्पहीनता की स्थिति में ही कोई अपने बालकों को हिन्दी माध्यम विद्यालयों में भेजता है। आज की अर्थव्यवस्था में अँगरेज़ी का बोलबाला तो निर्विवाद है। कृषि, लघु उद्यम, मजदूरी को छोड़ दें तो एक छोटी सी नौकरी पाने के लिए भी अँगरेज़ी का ज्ञान अनिवार्य योग्यता का हिस्सा हो चुका है, प्रबंधन की भाषा तो अँगरेज़ी है ही। अगर लोगों की मनोस्थिति को मापदंड मानें तो हिन्दी का एक भाषा के रूप में सम्मान तथा उपादेयता निश्चित तौर पर समाप्त हो चुकी है। इसका अस्तित्व महज मजबूरी या आनुष्ठानिक है। जहाँ  भारत का मध्यवर्ग अँगरेज़ी को अपनाने की पुरजोर कोशिश कर रहा है वहीं भारतीय अभिजन में तो हिन्दी घरेलू बोलचाल की भी भाषा नहीं रह गयी है। स्थिति इतनी गंभीर हो गई है कि हिन्दी फिल्मों के अभिनेता तथा अभिनेत्रियां, जो हिन्दी में लच्छेदार सम्वाद बोलने के कारण ही भारतीय आम जनता के बीच अपनी पहचान बनाए हुए हैं और उनके पसंदीदा कलाकार हैं वे भी रोजमर्रा के निजी तथा सामाजिक जीवन में इस भाषा का प्रयोग करना अपनी तौहीन मानते हैं। यह विचार की भाषा तो रही ही नहीं गयी है। अच्छे शोध, अच्छे विचार तथा शायद अच्छे साहित्य के लिए भी हिन्दी भाषी अँगरेज़ी भाषा पर निर्भर रहते हैं। साहित्य में तो भले ही इस भाषा की महत्ता को कमतर आंकना शायद उचित नहीं होगा,लेकिन मानविकी को छोड़ें तो समाज, प्राकृतिक तथा भौतिक विज्ञानों में इस भाषा का प्रयोग श्रेष्ठ संस्थानों में अपवाद स्वरूप ही होता है। तकनीक या प्रौद्योगिकी प्रशिक्षण, जिसका उद्देश्य मात्र विज्ञान को व्यवहारिक स्वरूप प्रदान करना है, वहाँ  भी भारती का प्रयोग नहीं के बराबर है। जिन लोगों ने हिन्दी को अपने शोध तथा सृजन का माध्यम बनाया हुआ है वे सामान्यतया अँगरेज़ी के प्रयोग में असमर्थ हैं। हिन्दी भाषी राज्यों के प्रशासन में अँगरेज़ी के प्रयोग को नीति के तहत हतोत्साहित किया जाता है, लेकिन उसके बावजूद निहायत ही देसी प्रकार के, आंचलिक शिक्षण संस्थानों में पढ़े, बड़े, मझोले तथा छोटे अधिकारी (ब्युरोक्रैट्स) भी मिली जुली, टूटी फूटी ही सही, अँगरेज़ी के उपयोग को अपने साहबीयत का अभिन्न हिस्सा मानते हैं। यहाँ  तक कि संसद में भी हिन्दी क्षेत्र के जन प्रतिनिधि भी यदि बोलने की स्थिति में हैं तो अँगरेज़ी ही बोलते हैं। बकौल उपराष्ट्रपति सह राज्यसभा अध्यक्ष श्री भैरों सिंह शेखावत, संसद में सांसद हिन्दी बोलने से कतराते हैं या यदि बोलते हैं तो उन्हें गम्भीरता से नहीं लिया जाता है(टाइम्स ऑफ इंडिया, पटना, 31 मई 2005)। उच्चतर न्यायालयों में तो हिन्दी को अभी तक अपनाया भी नहीं गया है।

उपर्युक्त संक्षिप्त विवरण का उद्देश्य भारत देश में ही भारती का दोयम दर्जे की भाषा के रूप में पतन को रेखांकित करना है। यह अत्यंत त्रासद विडम्बना है कि किसी देश की राष्ट्रभाषा स्वदेश में ही द्वितीयक श्रेणी की भाषा सिद्ध हो रही है। हालांकि वैश्वीकरण के इस युग में भारतीयों की आंग्ल भाषा में प्रवीणता भारत की विशेषता के रूप में देखी जाती है खासकर चीन की तुलना में। चीन से जब भी भारत की तुलना आर्थिक विकास के क्षेत्र में की जाती है तो भारत में अँगरेज़ी के प्रचलन को भारत के पक्ष में देखा जाता है। चीन भी इस कमी को दूर करने में युद्ध-स्तर पर लगा हुआ है। एक आकलन के अनुसार चीन में अभी छः करोड़ लोग अँगरेज़ी का अध्ययन कर रहे हैं। ऐसा समय दूर नहीं कि जब दुनिया में सबसे ज्यादा आंग्लभाषी चीन में होंगे। अँगरेज़ी सीखना आज समय की माँग है। इसे सीखना प्रायः विश्व बाजार में प्रतियोगी रहने की आवश्यकता है। अँगरेज़ी सीखना गलत भी नहीं है और अँगरेज़ी का विरोध तो देशवासियों के लिए अत्यंत अहितकर है खासकर गरीब तबकों के लिए। यदि अँगरेज़ी हटायी जाती है तो यह सरकारी विद्यालयों से ही हटेगी तथा इसकी सबसे ज्यादा मार गरीबों पर पड़ेगी। गरीबी दूर करने का यदि एक माध्यम शिक्षा है तो शिक्षा अँगरेज़ी माध्यम में इस उद्देश्य को प्राप्त करने में और भी प्रभावी होगी। यहाँ  पैरोकारी जैसा कि स्पष्ट है कि अँगरेज़ी का विरोध नहीं है बल्कि भारती की प्रतिष्ठा तथा उपादेयता में विस्तार कर इसे अधिक ग्राहृय बनाने पर विचार करना है तथा एक दूरगामी लक्ष्य के रूप में इसे विश्वभाषा के रूप में मान्यता दिलवाना है।

उन्नति का मार्ग – हिन्दी को सशक्त बनाने का उत्तरदायित्व हर हिन्दी भाषी का है। यह उसके लिए मात्र भावनात्मक प्रश्न नहीं है। इससे उसका आर्थिक, राजनीतिक तथा सांस्कृतिक हित जुड़ा है। साथ ही यह भी समझने की आवश्यकता है कि अँगरेज़ी भाषा का वह कितना गहन अध्ययन करे, कितना भी इसका अभ्यास करें, चूंकि यह एक विदेशी भाषा है और विदेशी संस्कृति की अभिव्यक्ति है, वह इस भाषा में उस स्तर का प्रावीण्य प्राप्त नहीं कर सकता है जो देशज भाषा में उसे सहज प्राप्त होता है। अँगरेज़ी भाषाइयों में उसकी पहचान तो एक शरणार्थी की ही रहेगी चाहे वह कुछ भी कर ले। यदि वह अँगरेज़ी में प्राकृतिक प्रवीणता हासिल कर भी लेता है तो वह ऐसा अपनी संस्कृति से बिलगाव की कीमत पर करता है। अतः प्रत्येक हिन्दी भाषी स्वयं तथा हर तरह तथा हर स्तर के संगठन,जिस पर उसका प्रभाव है, मैं प्रयास करे कि हिन्दी के प्रभाव में वृध्दि हो। ऐसी स्थिति बनने पर ही सरकारी प्रयासों में भी गम्भीरता तथा ईमानदारी दिखने की सम्भावना है।

यहाँ यह भी स्मरण रखने की आवश्यकता है कि जब भी हिन्दी के प्रसार का प्रयास हो तो उसमें किसी तरह के वर्चस्व की भावना बिलकुल नहीं होनी चाहिए। हिन्दी का प्रत्येक भारतीय भाषा से सहयोगात्मक रवैया होना चाहिए तथा नीति सहविकास की होनी चाहिए। यहाँ  तक कि हिन्दी भाषी क्षेत्र में भी हिन्दी को शिक्षण संस्थानों पर थोपना भी अनुचित होगा। यह हर सामान्य शिक्षण संस्थान का विद्यालय से लेकर विश्वविद्यालय तक को अधिकार होना चाहिए कि वह आवश्यकतानुसार अपने शोध तथा शिक्षण के माध्यम का चयन करे। आज अँगरेज़ी का विरोध वास्तव में अप्रासंगिक हो चुका है। इस भाषा में भारतीयों की प्रवीणता देश के लिए लाभदायक सिद्ध हो रही है। आज देश में जरूरत है कि ज्यादा लोग अच्छी अँगरेज़ी सीखें। यह देश की आर्थिक प्रगति के लिए आवश्यकता है, लेकिन यह ध्यान रखना नितांत आवश्यक है कि अँगरेज़ी एक साधन है न कि साध्य। अँगरेज़ी सीखना चाहिए लेकिन एक उपकरण के रूप में। सीखना गलत नहीं है, लगत है अँगरेज़ी के प्रति समर्पण, उसकी आराधना। गलत है भारती का तिरस्कार, उसकी अवमानना।

जहाँ तक विदेशों में हिन्दी के प्रचार-प्रसार की बात है उसमें भी साम्राज्यवादी प्रवृत्ति लेशमात्र नहीं होनी चाहिए। इसके विपरीत भारती के प्रसार का उद्देश्य भाषाई साम्राज्यवाद, जो वृहत्तर साम्राज्यवाद का ही हिस्सा है, का प्रतिकार होना चाहिए। साम्राज्यवाद का प्रतिकार वैकल्पिक साम्राज्यवाद नहीं वरन् अन्य भाषाओं का संरक्षण है। आज यदि विश्व की आवश्यकता जैव विविधता है तो विश्व समाज की जरूरत इसकी सांस्कृतिक विविधता की रक्षा है। भारती के प्रसार का प्रयास परस्पर आदान-प्रदान के आधार पर हो। हिन्दी भाषी विश्व की तमाम संस्कृतियों से उनकी भाषा सीखकर सीधा सम्पर्क कायम करें तथा उसके साथ ही भारती के प्रसार का प्रयास करें, यही उचित होगा।

भारती के सशकत बनाने के लिए आधारभूत आवश्यकता है कि हिन्दी भाषी क्षेत्र का आर्थिक विकास तीव्र गति से हो। भाषा की प्रतिष्ठा के लिए मात्र यह आवश्यक नहीं है कि वह भाषा कितनी बड़ी संख्या में लोगों के द्वारा बोली जाती है। महत्वपूर्ण यह है कि भाषियों की आर्थिक स्थिति क्या है? आर्थिक विकास के लिए राजनीति तथा प्रशासन को इस दिशा में प्रवृत्त करने की आवश्यकता है।

उपर्युक्त तथ्य तो मूलभूत है लेकिन जो विषय प्राथमिक तथा ज्वलंत है, वह इस क्षेत्र में शिक्षा की खासकर उच्च शिक्षा की त्रासद स्थिति है। आज इस क्षेत्र में निम्न स्तरीय राजनीति के कारण शिक्षा व्यवस्था पतन के गर्त मे है। इस क्षेत्र में शिक्षा का विश्वस्तरीय उन्नयन भारती के विकास में भी सहायक होगा। भाषा के उपादेयता तथा प्रतिष्ठा के लिए नितांत आवश्यक शर्तें हैं कि किसी भाषा में किस तरह का ज्ञान सृजित, संग्रहित तथा प्रसारित हो रहा है? हर विश्वविद्यालय में यह होना चाहिए कि वह अपने यहाँ  शोध, अध्यापन के लिए हिन्दी भाषा के लिए अलग से विशेष महाविद्यालयों की स्थापना करें। ऐसा भी हो सकता है कि प्रत्येक राज्य में एक ऐसे विश्वविद्यालय की अलग से स्थापना की जाए जहाँ  ज्ञान क्षेत्र की प्रत्येक विधा को स्थान प्राप्त हो तथा वहाँ  अध्यापन तथा शोध की आधार भाषा मात्र हिन्दी हो। इस तरह के विद्यापीठ हिन्दी में ज्ञान के उद्गम स्थल होंगे।

हिन्दी भाषा में साहित्य तथा ज्ञान-विज्ञान में लेखन को हर स्तर पर प्रोत्साहित किए जाने की आवश्यकता है। इसके लिए भरपूर संख्या में पुरस्कारों, अनुदानों, कार्यक्रमों तथा परियोजनाओं की व्यवस्था स्थानीय, प्रांतीय, राष्ट्रीय तथा अंतर्राष्ट्रीय स्तरों पर होनी चाहिए। विश्व के प्रत्येक देश, बड़े शहरों तथा अधिक से अधिक शिक्षण संस्थानों में हिन्दी में अध्यापन तथा शोध की व्यवस्था होनी चाहिए। खासकर अहिन्दीभाषी क्षेत्रों में तथा विदेशों में हिन्दी के प्रचार-प्रसार को अभियान के अंतर्गत चलाया जाना चाहिए।

हिन्दी के पुस्तकों के प्रकाशन पर तथा उस प्रक्रिया में प्रयुक्त हर सामग्री तथा चल-अचल सम्पत्ति कर मुक्त हो तथा यथासम्भव सब्सिडी भी हिन्दी प्रकाशन उद्योग को मिले। भारत तथा समस्त विश्व के कोने-कोने में जितना ज्यादा सम्भव हो हिन्दी पुस्तकालयों की स्थापना की जाए। इसके अलावा ऐसी प्रतियोगिताओं का आयोजन हो जिससे ज्यादा से ज्यादा लोग हिन्दी पढ़ने तथा बोलने को प्रेरित हों।

हिन्दी भाषी राज्यों में प्रशासन की भाषा हिन्दी मात्र होनी चाहिए। विदेशी आगंतुक, पर्यटकों तथा निवेशकों से संवाद के लिए दुभाषिये रखे जा सकते हैं। राजकीय सेवाओं में भर्ती के लिए हिन्दी का यथेष्ठ ज्ञान अनिवार्य अर्हता होनी चाहिए। यहाँ  यह भी रेखांकित करना आवश्यक है कि हिन्दी के प्रचार-प्रसार की प्राथमिक भूमिका हिन्दी भाषी राज्यों की है न कि केन्द्र सरकार की।

भारती का प्रसार मात्र भावनात्मक प्रश्न नहीं है, इसका महत्व आर्थिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक तथा अंतर्राष्ट्रीय है। अतएव इसके प्रचार पर खर्च को निवेश तथा सामाजिक कल्याण के तहत अनिवार्य मानना चाहिए।

नीतिक, सांस्कृतिक तथा अंतर्राष्ट्रीय है। अतएव इसके प्रचार पर खर्च को निवेश तथा सामाजिक कल्याण के तहत अनिवार्य मानना चाहिए।

हिन्दी एवं प्रवासी भारतीयों की वर्तमान पीढ़ी

हम जब भी इंगलैण्ड में हिन्दी के विषय में बात करते हैं तो हम भावनात्मक हो जाते हैं और अपनी तर्क शक्ति को ताक पर रख देते हैं। हम यह सोच कर नाराज़गी ज़रूर ज़ाहिर करते हैं कि युनाईटेड किंगडम में कभी जी.सी.एस.सी.में हिन्दी एक एच्छिक विषय के तौर पर पढ़ाई जाती थी। आज स्कूलों में हिन्दी कहीं नहीं दिखाई देती। हिन्दी मंदिरों और निजी शिक्षकों के घरों तक सीमित हो गई है।

किसी भी विषय पर बातचीत से पहले आवश्यक है कि हम उस विषय की वस्तुस्थिति को ठीक से समझ लें। वस्तुस्थिति यह है कि एक भाषा के रूप में इंग्लैण्ड में हिन्दी का वर्तमान बहुत संतोषजनक नहीं है और इसके भविष्य के लिए भी बिना अति आशावादी बने हमें केवल कर्म करना सीखना होगा। अतीत में हिन्दी इंग्लैण्ड में स्कूलों में एक एच्छिक विषय के तौर पर पढ़ाई जाती थी, लेकिन हिन्दी स्कूलों से ग़ायब हो गई क्योंकि उन स्कूलों में हिन्दी पढ़ने वाले विद्यार्थी मिल नहीं पा रहे थे। आजकल इंग्लैण्ड में बहुत सी ग़ैर-सरकारी संस्थाएं हिन्दी भाषा,साहित्य और संस्कृति के प्रचार प्रसार के कामों में जुटी हैं। देश भर में हिन्दी ज्ञान प्रतियोगिताएं करवाई जा रही हैं,कहानी कार्यशालाएं की जा रही हैं, हिन्दी में कम्पयूटर में काम काज पर ध्यान दिया जा रहा है। लेकिन बिना किसी विश्विद्यालय से पंजीकृत हुए बिना यह गतिविधियाँ आधिकारिक स्वरूप नहीं पा सकती हैं।

हमें भावनाओं को तज कर इस ओर ध्यान देना होगा कि आखिर ऐसा हुआ क्यों। निरपेक्ष रूप से किसी नतीजे पर पहुंचना होगा। जब हम भारत से इंगलैण्ड आए प्रवासियों पर नज़र डालें तो पाएंगे कि भारत से इंगलैण्ड आने वालों में सबसे अधिक संख्या गुजरात एवं पंजाब प्रदेशों से है। पंजाब से आने वालों में भी सिख धर्म के अनुयायियों की संख्या कहीं अधिक है, जिनकी मातृभाषा हिन्दी नहीं पंजाबी है। इस के अतिरिक्त तमिल, बंगाली एवं महाराष्ट्रियन भी काफ़ी संख्या में यहाँ प्रवासी बन कर आए। इन सभी के लिए हिन्दी बोलचाल की भाषा तो थी, लेकिन कहीं भी लिखने पढ़ने वाली भाषा नहीं थी। इसलिए जब पहली पीढ़ी के प्रवासियों ने पाया कि उन्हें विलायत में सबसे अधिक समस्या उन्हें अंग्रेजी न आने से हो रही है तो उन्होंने अपनी आगामी पीढ़ी से घर में तो अपनी मातृभाषा में बातचीत जारी रखी लेकिन बाहर दुनिया से संघर्ष करने के लिए उन्हें अंग्रेज़ी सीखने के लिए बढ़ावा दिया। यानी कि इंगलैण्ड आने वाले अधिकतर भारतीय मूल के परिवारों के लिए हिन्दी मात्र एक बोली थी जिस के माध्यम से वे दूसरे राज्य के रहने वालों से बातचीत कर सकते थे यानि कि संपर्क भाषा। और संपर्क भाषा भी निम्न मध्य वर्ग के लोगों के लिए। मध्य वर्ग या फिर उच्च मध्य वर्ग की संपर्क भाषा अंग्रेजी ही थी। हमे याद रखना यह होगा कि यह भी प्रवासियों की पहली पीढ़ी तक ही सीमित था। उसके बाद की पीढ़ियों की अपनी एक जबान बन चुकी थी – अँगरेज़ी।

हिन्दी बोलने वाले परिवारों में भी बच्चों को यही कहा जाता था, “अरे हिन्दी सीख लो। कल को भारत जाओगे, तो दादी और नानी से कैसे बात करोगे।’  मूलभूत समस्या यह है कि जो लोग अपने बच्चों को यह समझाया करते थे,आज वही दादा दादी और नाना नानी बन चुके हैं। और उन सबको अँगरेज़ी आती है। इसलिए उनके लिए आजके बच्चों को दादी और नानी के हवाले देकर हिन्दी सीखने के लिए कहना भी संभव नहीं।

पहली पीढ़ी के प्रवासियों के पास न तो कोई ज़रिया था और न ही हिम्मत कि वे हिन्दी के लिए समय निकाल पाते। शायद उन्हें इस की आवश्यक्ता भी नहीं थी। उस समय न तो कोई हिन्दी का रेडियो स्टेशन था और न ही किसी अँगरेज़ी के रेडियो अथवा टेलिविज़न सेन्टर से ही कोई हिन्दी के कार्यक्रम प्रसारित होते थे। जीवन इतना संघर्षपूर्ण था कि हिन्दी के लिए समय निकाल पाना लगभग अय्याशी के समान हो जाता।

अस्सी के दशक में विडियो रिकॉर्डर की लोकप्रियता और हिन्दी फ़िल्मों की कानूनी और ग़ैर-कानूनी वीडियो केसेटों ने इंगलैण्ड में हिन्दी को लोकप्रिय बनने का अचानक एक अभूतपूर्व अवसर प्रदान किया। बच्चे बड़े सभी इकठ्ठे बैठ कर अमिताभ बच्चन की फ़िल्में देखा करते थे। शोले फ़िल्म के डायलॉग याद करके इंग्लैण्ड के बच्चे भारत से आने वाले अतिथियों पर अपने हिन्दी ज्ञान की धाक जमाते थे। प्रवासियों की पहली पीढ़ी को भी अचानक जैसे अपने पैरों तले एक नई ज़मीन का अहसास होने लगा था। डा हरिवंश राय बच्चन अवश्य ही हिन्दी के महान् कवियों में से एक हैं। किन्तु हिन्दी भाषा को लोकप्रिय बनाने के मामले में उनके पुत्र अमिताभ ने उन्हें कहीं पीछे छोड़ दिया।

स्कूलों में हिन्दी पढ़ने की न तो किसी को आवश्यकता महसूस होती थी और न ही किसी को इस बात का ख़्याल ही आता था। हिन्दी भाषी परिवारों को इस बात की प्रसन्नता थी कि उनकी संताने कम से कम हिन्दी बोलने तो लगी हैं। वहीं ग़ैर हिन्दी भाषी परिवारों के लिए हिन्दी फ़िल्में भारत से जुड़ने के एक साधन के रूप में उभर कर आई थीं। इंगलैण्ड में भारत से जुड़ाव के लिए हिन्दी फ़िल्मों के अतिरिक्त भारतीय क्रिकेट का भी खासा योगदान रहा। ख़ास तौर पर कपिल देव की टीम द्वारा 1984 में क्रिकेट के विश्व कप विजेता के रूप में उभर कर आने से भी यहां के बच्चों का भारत के प्रति अधिक सकारात्मक रुख पैदा हुआ। यही वह समय भी था जब बीबीसी ने रामायण और महाभारत जैसे विशुद्ध भारतीय टेलिविज़न सीरियल अपने चैनल पर दिखाने शुरू किये। भारतीय परिवारों के पास आज भी उन सीरियलों की रिकॉर्ड की गई व्हिडियो कैसेट मिल जाएंगी। भारतीय मूल के परिवारों में हिन्दी का माहौल पैदा करने में इन दो महत्वपूर्ण सीरियलों का योगदान कभी नहीं भुलाया जा सकता।

जी़ टीवी का आगमन इंग्लैण्ड में हिन्दी के लिए एक महत्वपूर्ण घटना माना जा सकता है। अब उन घरों की दीवारें भी हिन्दी सुन सकती थीं जहाँ पहली व दूसरी या तीसरी पीढ़ी या तो अपनी मातृभाषा में बातचीत करती थीं या फिर अँगरेज़ी में। भारत में भी हिन्दी फ़िल्में मुख्यधारा की फ़िल्में मानी जाती हैं तो अन्य भाषाओं की फ़िल्में केवल क्षेत्रीय सीमाओं में बन्ध कर रह जाती हैं। फिर मराठी, गुजराती, पंजाबी, हरियाणवी, आदि भाषाओं की आम फ़िल्मों का स्तर भी कुछ विशेष अच्छा नहीं होता। इसलिए भी ज़ी टीवी के लिए यह एक महत्वपूर्ण पल था और उनके सामने कोई प्रतियोगी भी नहीं था। लेकिन एक बात देखी गई कि भारतीय मूल के ब्रिटिश बच्चे बॉलीवुड की फ़िल्मों में तो रूचि रखते हैं वहीं टेलिविजन सीरियल क्योंकि लम्बे खिंचते जाते हैं, यहाँ के बच्चे उनसे कतराते हैं। जहाँ एक ओर सनराईज रेडियो के रवि शर्मा, सरिता सभरवाल, रिकी लोबो, राम भट्ट इत्यादि तो भारतीय मूल के बच्चों के चहेते बन जाते हैं वहीं हिन्दी टेलीविज़न सीरियल उनके साथ कोई सम्बंध स्थापित नहीं कर पाते हैं।

हिन्दी की मूलभूत समस्या यह भी है कि भारत में ही उसको उसका उचित स्थान नहीं मिल पाया है। विदेशों में अब तक हुए सभी विश्व हिन्दी सम्मेलनों में एकमत से यह प्रस्ताव पारित किया जाता रहा है कि ‘हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र संघ की भाषा बनाया जाए।’ किसी भी भाषा के साथ इससे बड़ा मज़ाक हो ही नहीं सकता जो भाषा किसी देश की संसद की भाषा बनने के काबिल भी नहीं मानी जाती, उसे संयुक्त राष्ट्र संघ की भाषा क्यों और किसके लिए बनाया जाए। जब कोई भूतलिंगम या श्रीनिवासन संयुक्त राष्ट्र संघ में भारत का प्रतिनिधित्व करेगा तो उसे स्वयं ही हिन्दी भाषा समझ नहीं आएगी। तो फिर यह नाटक किसके लिए कि हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र संघ की भाषा बनाया जाए। उसे वहाँ सुनेगा कौन? जब भारतीय मूल के लोग अपने बच्चों को ले कर भारत यात्रा पर ले कर जाते हैं तो बच्चे यह देख कर हैरान हो जाते हैं कि भारत में उनके समवयस्क हिन्दी बोलना छोटेपन का द्योतक मानते हैं। वहाँ का युवावर्ग इंग्लैण्ड के युवाओं से अधिक अंग्रेज़ीदां है।

यह पूछना एक फ़ैशन सा भी बन गया है कि यदि जापान और जर्मनी बिना अँगरेज़ी के आर्थिक ऊँचाईयों तक पहुँच सकते हैं, तो फिर भारत में हिन्दी की इतनी दुर्दशा क्यों। भारत एक विशाल देश है जिसकी एक भाषा कभी भी नहीं रही। हिन्दी कभी भी भारत में राजकाज की भाषा नहीं रही है। यह कभी संस्कृत थी तो कभी फ़ारसी तो कभी उर्दू। और आज यह स्थान अँगरेज़ी के हिस्से में है। इसलिए यह प्रश्न एक प्रकार से बेमानी सा हो जाता है। जो भाषा कभी भी पूरे भारत की भाषा नहीं रही, वो भला जापानी या जर्मनी भाषा का मुक़ाबला किस प्रकार कर सकती है।

कहीं कहीं ग़लतफ़हमी यह भी है कि हिन्दी भारत की राष्ट्रभाषा है। वास्तविकता यह है कि हिन्दी को भारत की राजभाषा घोषित किया गया था और जब तक हिन्दी पूरी तरह से कामकाज के काबिल नहीं बन जाती राजकाज का काम अँगरेज़ी में भी किया जाएगा। यह ‘अँगरेज़ी में भी’ आजतक ‘अँगरेज़ी में ही’ बना हुआ है। भारत सरकार पचपन वर्षों में भी हिन्दी को इतना सक्षम नहीं बना पाई है कि राज काज का काम हिन्दी में किया जा सके। ‘अँगरेज़ी में भी’के स्थान पर सरकारी काम काज ‘हिन्दी में भी’ करवाया जाता है।

इंग्लैण्ड में जब कभी किसी भी हिन्दी अथवा किसी अन्य भारतीय भाषा के कार्यक्रम में जाने का अवसर मिलता है तो दिल में कहीं एक अन्जाना सा डर बैठने लगता है कि अगले कार्यक्रम से पहले कौन-सा पीला पत्ता पेड़ से गिर चुका होगा। उन कार्यक्रमों में आने वालों की औसत आयु पचास वर्ष के उपर ही महसूस होती है। इस देश की नई पीढ़ी को हिन्दी साहित्य के कार्यक्रमों में तो कोई रूचि नहीं है, लेकिन देखने को मिला है कि जब कभी बॉलीवुड के कार्यक्रम होते हैं या फिर ऐसे हास्य नाटकों का मंचन हो जैसे कि शादी एट बरबादी डॉट कॉम, नॉटी एट फ़ॉर्टी, हनीमून इत्यादि तो नई पीढ़ी भी हंसने के लिए पहुंच जाती है।

जिस प्रकार भारतीय उच्चायोग, यू.के. हिन्दी समिति, कथा (यूके), गीतांजलि बहुभाषी समाज, कृति यू.के., भारतीय भाषा संगम इत्यादि संस्थाएं इंग्लैण्ड में हिन्दी के प्रचार प्रसार में जुटे हैं, नि:स्सवार्थ भाव से देश भर में हिन्दी पढ़ाते अध्यापक एवं साथ ही साथ बॉलीवुड की फ़िल्मों को इंगलैण्ड के मुख्यधारा सिनेमाघरों में दिखाने की शुरूआत हुई है,उससे उम्मीद बंधती है कि हमें निराश होने की कोई आवश्यकता नहीं है। मंजिल दूर अवश्य हो सकती है, किन्तु यात्रा में सफलता अवश्य मिलेगी।

एक उदाहरण अपने घर से भी देना चाहूँगा। मेरी गुजराती(भाषी) पत्नी मेरे छोटे पुत्र से (जिसका जन्म लंदन में ही हुआ था) गुजराती में बात करती है। मेरा पुत्र उसे हिन्दी में जवाब देता है लेकिन मेरी ओर देखते ही अँगरेज़ी में बात करने लगता है। है न ख़ासी दिलचस्प स्थिति ! संयुक्त राष्ट्र संघ की आधिकारिक भाषाएँ एवं हिन्दी

संयुक्त राष्ट्र संघ की 6 आधिकारिक भाषाएँ हैं : 1. अरबी, 2. चीनी 3. अँगरेज़ी 4. फ्रेंच, 5. रूसी 6. स्पेनिश (देखिए- Year Book of the United Nations 1955, Vol. 49, pp. 1416-17, New York )

अन्य अन्तर्राष्ट्रीय संगठनों की आधिकारिक भाषाएँ :संयुक्त राष्ट्र की ये 6 आधिकारिक भाषाएँ अन्य अन्तर्राष्ट्रीय संगठनों की भी आधिकारिक भाषाएँ हैं। उदाहरणार्थ : (1) अन्तर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) (2)अन्तर्राष्ट्रीय विकास एजेंसी (IDA) (3) अन्तर्राष्ट्रीय दूरसंचार संघ (ITU) (4) संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक संगठन (UNESCO) (5) विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) (6) संयुक्त राष्ट्र औद्योगिक विकास संगठन(UNIDO) (7) संयुक्त राष्ट्र अन्तर्राष्ट्रीय बाल-आपातिक निधि (UNICEFसंयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषाएँ एवं हिन्दी : सन् 1998 के पूर्व, मातृभाषियों की संख्या की दृष्टि से विश्व में सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषाओं के जो आँकड़े मिलते थे, उनमें हिन्दी को तीसरा स्थान दिया जाता था। सन् 1991 के सैन्सस आफ इण्डिया का भारतीय भाषाओं के विश्लेषण का ग्रन्थ जुलाई, 1997 में प्रकाशित हुआ (दे. Census of India 1991 Series 1 – India Part I of 1997, Language : India and states – Table C-7) यूनेस्को की टेक्नीकल कमेटी फॉर द वॅ:ल्ड लैंग्वेजिज रिपोर्ट ने अपने दिनांक 13 जुलाई, 1998 के पत्र के द्वारा यूनेस्को-प्रश्नावली के आधार पर हिन्दी की रिपोर्ट भेजने के लिए भारत सरकार से निवेदन किया। भारत सरकार ने उक्त दायित्व के निर्वाह के लिए केन्द्रीय हिन्दी संस्थान के तत्कालीन निदेशक प्रोफेसर महावीर सरन जैन को पत्र लिखा। प्रोफेसर महावीर सरन जैन ने दिनांक 25 मई,1999को यूनेस्को को अपनी विस्तृत रिपोर्ट भेजी।

प्रोफेसर जैन ने विभिन्न भाषाओं के प्रामाणिक आँकड़ों एवं तथ्यों के आधार पर यह सिद्ध किया कि प्रयोक्ताओं की दृष्टि से विश्व में चीनी भाषा के बाद दूसरा स्थान हिन्दी भाषा का है। रिपोर्ट तैयार करते समय प्रोफेसर जैन ने ब्रिटिश काउन्सिल आफ इण्डिया से अँगरेज़ी मातृभाषियों की पूरे विश्व की जनसंख्या के बारे में तथ्यात्मक रिपोर्ट भेजने के लिए निवेदन किया। ब्रिटिश काउन्सिल ऑफ इण्डिया ने इसके उत्तर में गिनीज बुक आफ नालेज (1997संस्करण, पृष्ठ-57) फैक्स द्वारा भेजा। ब्रिटिश काउन्सिल द्वारा भेजी गई सूचना के अनुसार पूरे विश्व में  अँगरेज़ी मातृभाषियों की  संख्या 33,70,00,000 (33 करोड़, 70 लाख) है। सन् 1991 की जनगणना के अनुसार भारत की पूरी आबादी 83,85,83,988 है। मातृभाषा के रूप में हिन्दी को स्वीकार करने वालों की संख्या 33,72,72,114 है तथा उर्दू को मातृभाषा के रूप में स्वीकार करने वालों की संख्या का योग 04,34,06,932 है। हिन्दी एवं उर्दू को मातृभाषा के रूप में स्वीकार करने वालों की संख्या का योग 38,06,79,046 है जो भारत की पूरी आबादी का 44.98 प्रतिशत है। प्रोफेसर जैन ने अपनी रिपोर्ट में यह भी सिध्द किया कि भाषिक दृष्टि से हिन्दी और उर्दू में कोई अंतर नहीं है। इस प्रकार ब्रिटेन, अमेरिका, कनाडा, आयरलैंड, आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड आदि सभी देशों के अँगरेज़ी मातृभाषियों की संख्या के योग से अधिक जनसंख्या केवल भारत में हिन्दी एवं उर्दू भाषियों की है। रिपोर्ट में यह भी प्रतिपादित किया गया कि ऐतिहासिक, सांस्कृतिक एवं सामाजिक कारणों से सम्पूर्ण भारत में मानक हिन्दी के व्यावहारिक रूप का प्रसार बहुत अधिक है। हिन्दीतर भाषी राज्यों में बहुसंख्यक द्विभाषिक-समुदाय द्वितीय भाषा के रूप में अन्य किसी भाषा की अपेक्षा हिन्दी का अधिक प्रयोग करता है जो हिन्दी के सार्वदेशिक व्यवहार का प्रमाण है। भारत की राजभाषा हिन्दी है तथा पाकिस्तान की राज्यभाषा उर्दू है। इस कारण हिन्दी-उर्दू भारत एवं पाकिस्तान में संपर्क भाषा के रूप में व्यवहृत है।

विश्व के लगभग 93 देशों में हिन्दी का या तो जीवन के विविध क्षेत्रों में प्रयोग होता है अथवा उन देशों में हिन्दी के अध्ययन-अध्यापन की सम्यक् व्यवस्था है। चीनी भाषा के बोलने वालों की संख्या हिन्दी भाषा से अधिक है किन्तु चीनी भाषा का प्रयोग क्षेत्र हिन्दी की अपेक्षा सीमित है। अँगरेज़ी भाषा का प्रयोग क्षेत्र हिन्दी की अपेक्षा अधिक है किन्तु हिन्दी बोलने वालों की संख्या अँगरेज़ी भाषियों से अधिक है। विश्व के इन 93 देशों को हम तीन वर्गों में विभाजित कर सकते हैं।

(I)  इस वर्ग के देशों में भारतीय मूल के आप्रवासी नागरिकों की आबादी देश की जनसंख्या में लगभग 40 प्रतिशत या उससे अधिक है। इन अधिकांश देशों में सरकारी एवं गैर-सरकारी प्राथमिक एवं माध्यमिक स्कूलों में हिन्दी का शिक्षण होता है। इन देशों के अधिकांश भारतीय मूल के आप्रवासी जीवन के विविध क्षेत्रों में हिन्दी का प्रयोग करते हैं एवं अपनी सांस्कृतिक पहचान के प्रतीक के रूप में हिन्दी को ग्रहण करते हैं। इन देशों में निम्नलिखित देश उल्लेखनीय हैं- 1.मारीशस 2. फिजी 3. सूरीनाम 4. गयाना 5. त्रिनिडाड एण्ड टुबेगो। त्रिनिडाड के अतिरिक्त अन्य सभी देशों में हिन्दी का व्यापक प्रयोग एवं व्यवहार होता है।

(II)  इस वर्ग के देशों में ऐसे निवासी रहते हैं जो हिन्दी को विश्व भाषा के रूप में सीखते हैं, पढ़ते हैं तथा हिन्दी में लिखते हैं। इन देशों की विभिन्न शिक्षण संस्थाओं में प्राय: स्नातक एवं/अथवा स्नातकोत्तर स्तर पर हिन्दी की शिक्षा का प्रबन्ध है। कुछ देशों के विश्वविद्यालयों में हिन्दी में शोध कार्य करने तथा डाक्टरेट की उपाधि प्राप्त करने की भी व्यवस्था है। इन देशों में निम्नलिखित देशों के नाम उल्लेखनीय हैं –

महाद्वीप – देश

(क)   अमेरिका महाद्वीप:  6. संयुक्त राज्य अमेरिका 7. कनाडा 8. मैक्सिको  9. क्यूबा

(ख) यूरोप महाद्वीप:  10. रूस 11. ब्रिटेन (इंग्लैण्ड) 12. जर्मनी 13. फ्रांस 14. बेल्जियम 15. हालैण्ड (नीदरलैण्ड्स) 16. आस्ट्रिया 17. स्विटजरलैण्ड  18. डेनमार्क 19. नार्वे 20. स्वीडन 21. फिनलैंड 22. इटली 23. पौलैंड 24. चेक 25.हंगरी 26. रोमानिया 27. बल्गारिया 28. उक्रैन 29. क्रोशिया (ग)  अफ्रीका महाद्वीप : 30. दक्षिण अफ्रीका 31. री-यूनियन द्वीप

(घ)   एशिया महाद्वीप :  32. पाकिस्तान 33. बंग्लादेश 34. श्रीलंका 35. नेपाल 36. भूटान 37. म्यंमार (बर्मा) 38.चीन 39. जापान 40. दक्षिण कोरिया 41. मंगोलिया 42. उजबेकिस्तान 43. ताजिकस्तान 44. तुर्की 45. थाइलैण्ड

(ड) आस्ट्रेलिया :  46. आस्ट्रेलिया

(III) इसका उल्लेख किया जा चुका है कि भारत की राजभाषा हिन्दी है तथा पाकिस्तान की राज्यभाषा उर्दू है। इस कारण हिन्दी-उर्दू भारत एवं पाकिस्तान में संपर्क भाषा के रूप में व्यवहृत है। भारत एवं पाकिस्तान के अलावा हिन्दी एवं उर्दू मातृभाषियों की बहुत बड़ी संख्या विश्व के लगभग 60 देशों में निवास करती है। इन देशों में भारत,पाकिस्तान, बंगलादेश, भूटान, नेपाल आदि देशों के आप्रवासियों/अनिवासियों की विपुल आबादी रहती है। इन देशों की यह आबादी सम्पर्क-भाषा के रूप में ‘हिन्दी-उर्दू’ का प्रयोग करती है, हिन्दी की फिल्में देखती है; हिन्दी के गाने सुनती है तथा टेलीविजन पर हिन्दी के कार्यक्रम देखती है। इन देशों में संयुक्त राज्य अमेरिका, कनाडा, मैक्सिको,ब्रिटेन (इंग्लैण्ड), जर्मनी, फ्रांस, हालैण्ड (नीदरलैण्ड्स), दक्षिण-अफ्रीका, दक्षिण-कोरिया, उजबेकिस्तान,ताजिकस्तान, थाइलैण्ड, आस्ट्रेलिया आदि देशों के अलावा निम्नलिखित देशों के नाम उल्लेखनीय हैं:- 47.अफगानिस्तान 48.अर्जेन्टीना 49. अल्जेरिया 50.इक्वेडोर 51 इण्डोनेशिया 52. इराक 53.ईरान 54. उगांडा55.ओमान 56. कजाकिस्तान 57. क़तर 58. कुवैत 59. केन्या 60. कोट डी’इवोइरे 61. ग्वाटेमाला 62. जमाइका 63.जाम्बिया 64. तंजानिया 65. नाइजीरिया 66. निकारागुआ 67. न्यूजीलैण्ड 68. पनामा 69. पुर्तगाल 70. पेरु 71.पैरागुवै 72. फिलिपाइन्स 73. बहरीन 74. ब्राजील 75. ब्रुनेई 76. मलेशिया 77. मिस्र 78. मेडागास्कर 79. मोजाम्बिक80. मोरक्को 81. मौरिटानिया 82. यमन 83. लीबिया 84. लेबनान 85. वेनेजुएला 86. सऊदी अरब 87. संयुक्त अरब अमीरात 88. सिंगापुर 89. सूडान 90. सेशेल्स 91. स्पेन 92. हांगकांग (चीन) 93 होंडूरास 

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