वरिष्ठ संपादक व पत्रकार बिजय कुमार जैन का कहना है ‘हिंदी’ को राष्ट्रभाषा का सम्मान मिले

राष्ट्रभाषा का शाब्दिक अर्थ है—समस्त राष्ट्र में प्रयुक्त भाषा अर्थात् आमजन की भाषा (जनभाषा), जो भाषा समस्त राष्ट्र में जन–जन के विचार–विनिमय का माध्यम हो, वह ‘राष्ट्रभाषा’ कहलाती है।
राष्ट्रभाषा राष्ट्रीय एकता एवं अंतरराष्ट्रीय संवाद सम्पर्वâ की आवश्यकता की ऊपज होती है, वैसे तो सभी भाषाएँ राष्ट्रभाषाएँ होती हैं, किन्तु राष्ट्र की जनता जब स्थानीय एवं तत्कालिक हितों व पूर्वाग्रहों से ऊपर उठकर अपने राष्ट्र की कई भाषाओं में से किसी ‘एक’ भाषा को चुनकर उसे राष्ट्रीय अस्मिता का आवश्यक उपादान समझने लगती है वो राष्ट्रभाषा है।
स्वतंत्रता संग्राम के दौरान राष्ट्रभाषा की आवश्यकता होती है। भारत के सन्दर्भ में इस आवश्यकता की पूर्ति ‘हिंदी’ ने की, यही कारण है कि ‘हिंदी’ स्वतंत्रता संग्राम के दौरान राष्ट्रभाषा बनी।
राष्ट्रभाषा शब्द कोई संवैधानिक नहीं है, बल्कि यह प्रयोगात्मक, व्यावहारिक व जनमान्यता प्राप्त शब्द है, राष्ट्रभाषा सामाजिक, सांस्कृतिक स्तर पर देश को जोड़ने का काम करती है अर्थात् राष्ट्रभाषा की प्राथमिक शर्त देश में विभिन्न समुदायों के बीच भावनात्मक एकता स्थापित करना है।

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